शनिवार, 12 मार्च 2011

लक्ष्मीकांत की लघुकथा - नुकसान

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एक दिन कलावती ने अपने घर के भगवान को ग्‍यारह रूपये का चढ़ावा चढ़ाया. उसके भगवान घर की आलमारी में एक आकर्षक फ्रेम में जड़े तस्‍वीर में विराजमान थे. प्रायः प्रतिदिन कलावती सुबह नहाने के बाद अपने भगवान की पूजा-अर्चना करती है. मन ही मन गायत्री मंत्र का जाप करती है, ओम जय जगदीश हरे गाते हुए आरती करती है.

एक दिन कलावती के मन में आया-भगवान ने उसे कितना कुछ दिया है, उसे भी भगवान को कुछ देना चाहिए. बस फिर क्‍या था ? जिस दिन कलावती ने एकादशी का व्रत रखा, उसने भाव-विभोर होकर तस्‍वीर वाले भगवान के सामने दस रूपये का एक नोट और एक रूपये का सिक्‍का रख दिया.

वे ग्‍यारह रूपये लगभग एक हफ़्‍ते तक भगवान के सामने पड़े रहे.

कलावती का पति माधव बहुत ही सीधा-सादा आदमी था. दुनियादारी के मामलों में कुछ-कुछ बेवकूफ जैसा. फिर भी वह ग्रामीण बैंक में मैनेजर था.

एक दिन सुबह साढ़े नौ बजे बैंक जाने के लिए जैसे ही माधव स्‍कूटर पर बैठा, कलावती ‘‘ एक मिनट रुकिए!...'' कहते हुए झट से घर के अंदर चली गयी. माधव रुक गया.

कलावती भगवान के सामने पड़े ग्‍यारह रूपये उठाकर झट से बाहर आ गयी.

‘‘ इसे किसी मंदिर में चढ़ा देना! भूलना मत! ये भगवान के लिए है.'' कलावती ने माधव को ग्‍यारह रूपये देते हुए कहा.

‘‘ ठीक है, चढ़ा दूँगा.'' माधव ने मुस्‍कुराते हुए कहा.

शाम साढ़े सात बजे माधव बैंक से घर लौटा. पार्वती ने मुस्‍कुराते हुए पति का स्‍वागत किया. पति को चाय-नाश्‍ता कराने के बाद कलावती ने माधव से पूछा-

‘‘ रूपये मंदिर में चढ़ा दिए थे ? ''

‘‘ हाँ! चढ़ा दिया था. '' माधव ने अंगड़ाई लेते हुए कहा.

‘‘ कहाँ चढ़ाए थे ? '' कलावती ने अगला सवाल किया.

‘‘ रास्‍ते में एक मंदिर पड़ता है. वहीं चढ़ा दिया था...''

‘‘ पुजारी जी को दिए थे या दानपात्र में डाले थे ?...'' कलावती ने माधव को घूरते हुए पूछा.

माधव चौंक गया. उसे इस तरह के पूछताछ की आशंका नहीं थी.

‘‘ मैं मंदिर के अंदर नहीं गया था...बाहर से ही चढ़ा दिया था...'' माधव ने हकलाते हुए कहा.

‘‘ मंदिर के अंदर नहीं गए, फिर कैसे चढ़ा दिए ? '' पार्वती ने बुरा सा मुँह बनाते हुए कहा.

‘‘ मंदिर के सामने खड़े एक आदमी को रूपये देकर उसे भगवान को चढ़ाने के लिए कह दिया था '' माधव ने बेहद मासूमियत से कहा.

‘‘ आप ख्‍़ाुद मंदिर के अंदर क्‍यों नहीं गए...? '' पार्वती ने झल्‍लाते हुए कहा.

‘‘ मैंने सोचा, कौन स्‍कूटर से उतरे, जूते उतार कर मंदिर के अंदर जाय...''

‘‘ क्‍या आपके सामने उस आदमी ने रूपये भगवान को चढ़ा दिए थे ? '' पार्वती ने माधव को घूरते हुए पूछा.

‘‘ चढ़ा दिया होगा...'' माधव ने धीरे से कहा.

‘‘ हे भगवान! एक काम भी तुम ढंग से नहीं कर सकते. '' कलावती ने अपने सिर पर हाथ रखते हुए कहा. फिर बड़बड़ाने लगी-‘‘ मंदिर के सामने तो भिखारी भी खड़े रहते हैं. दे आए होंगे किसी भिखारी को...वह भला क्‍यों चढ़ाएगा, खुद ही रख लिया होगा. कुछ देर तक वहाँ रुक कर देख नहीं सकते थे ?...''

‘‘ लेकिन वह आदमी भिखारी जैसा नहीं लग रहा था. '' माधव ने सहमते हुए कहा.

‘‘ चुप रहो!...धरम-करम के काम में हंसी-ठिठोली मुझे एकदम पसंद नहीं है. '' कलावती ने माधव को बुरी तरह से झाड़ दिया.

माधव चुप हो गया.

कुछ देर तक कलावती भी मौन रही. जैसे कुछ चिन्‍तन-मनन कर रही हो.

‘‘ कल मैं खुद ही मंदिर जाकर भगवान को ग्‍यारह रूपये चढ़ा दूँगी. तुमने तो करा ही दिया ग्‍यारह रूपये का नुकसान...'' पार्वती ने जैसे खुद से कहा.

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लक्ष्‍मीकांत

पता-14/260, इंदिरा नगर,

लखनऊ.

5 blogger-facebook:

  1. नुक्सान अच्छा लगा, हंसी रोक नहीं पा रहा हूँ

    @रश्मि जी, आपकी टिप्पणी समझ में नहीं आई,

    उत्तर देंहटाएं
  2. सबकी अपनी अपनी श्रद्धा होती है।

    उत्तर देंहटाएं
  3. lakhmikant ji ek achche gazalkar to he hi . aapne yah laghukatha padhakar aapne kahanikar hone ka bhi parichay diya... aapko bahut bahut badhai

    उत्तर देंहटाएं

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