शुक्रवार, 4 मार्च 2011

मालिनी गौतम की कविता - रिश्ते

बहुत उलझ गया है
यह रिश्ता,
तो चलो सुलझा लें
एक आसान तरीका
अपना लें,
सब कुछ भुला लें
और हो जाएं दूर, धीरे...धीरे,
कर दें रिश्ता खत्म, धीरे...धीरे
'स्लो पॉयज़न' की तरह
धीरे-धीरे मरने के लिए
हर दिन एक कुल्हाड़ी की मार
सहन करनी होगी,
तभी तो रिश्तों का वट वृक्ष
हर दिन
थोड़ा-थोड़ा कटेगा
गिरेगा और फिर
मर जायेगा।


टूट जायेंगे रिश्ते
हरी-चमचमाती पत्तियों से
डालियों से
और वृक्ष पर
बसने वाले बेनाम पंखियों से,
एक रिश्ते से जुड़े
अनगिनत रिश्ते।
पर क्या टूट पायेगा
रिश्ता जड़ों से?
कैसे निकल पायेगा
प्रेम का बीज
जो दबा हुआ है कहीं गहराइयों में
मनुष्य नाम का प्राणी
है बड़ा स्वार्थी,
दर्द से डरता है, बड़ा घबराता है
दूर भी होता है तो धीरे-धीरे।


एक और रिश्ते का सहारा ढूंढ़ लेता है
एक रिश्ते को खत्म करने से पहले।
पर इस तरह थोड़ा-थोड़ा मरने से
तो बेहतर है
मर जाना एक बार में
पर उफ ये आदमी !
किश्तों में जीने की आदत
हो गयी है इसे,
अब तो संबंध और प्रेम भी
'इंस्टोलमेंट' में होते हैं।


पर क्या इतना आसान है
दूर होना ?
किसी को भुलाना ?
वृक्ष के नामोनिशान को मिटाना ?
हर दिन अन्दर कुछ टूटता है
और किरचें चुभती रहतीं है
बड़ी देर तक
हम भुलावे में जीते रहते हैं
कि भूल रहे हैं किसी को
और हो रहे दूर धीरे....धीरे,
जब-जब गहराई में
दबे बीज को
मिलेगी हवा, मिट्टी, पानी
और अनुकूल वातावरण
हरी कोंपलें फिर से फूटेंगीं
यादें फिर हो जायेंगी ताजा
और ऑंखें हो जायेंगी नम
अपनी ही बेवफाई पर।

,--

डॉ मालिनी गौतम

मंगलज्योत सोसाईटी

संतरामपुर-३८९२६०

गुजरात

12 blogger-facebook:

  1. हर दिन एक कुल्हाड़ी की मार
    सहन करनी होगी,
    तभी तो रिश्तों का वट वृक्ष
    हर दिन
    थोड़ा-थोड़ा कटेगा
    गिरेगा और फिर
    मर जायेगा।


    पर क्या टूट पायेगा
    रिश्ता जड़ों से?

    किश्तों में जीने की आदत
    हो गयी है इसे,

    हर दिन अन्दर कुछ टूटता है
    और किरचें चुभती रहतीं है
    बड़ी देर तक
    हम भुलावे में जीते रहते हैं

    ....lagataa hai kirchen bahut gahre tak chubhee hain .......dukhad anubhootiyon kaa sahaj shabd chitra .......vaakai hm kishton men jeene -marne ke abhyast ho gaye hain.
    aaj transliteration kaam naheen kar rahaa, isliye hindi men naheen likh paa rahaa hoon....aajkal yah pareshaanee badhatee hee jaa rahee hai ....hai koyee upaay ? hm to thahre jangalee .....kuchh aap log sujhaaiye.

    उत्तर देंहटाएं
  2. तभी तो रिश्तों का वट वृक्ष
    हर दिन
    थोड़ा-थोड़ा कटेगा
    गिरेगा और फिर
    मर जायेगा।

    बहुत ही खूबसूरत

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (05.03.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.blogspot.com/
    चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

    उत्तर देंहटाएं
  4. आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (05.03.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.blogspot.com/
    चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

    उत्तर देंहटाएं
  5. प्रतिक्रिया देने के लिये धन्यवाद कौशलेन्द्र जी........
    .......मैं भला आपको क्या सुझाव दे पाऊँगी...? आप तो लम्बे समय से इंटरनेट से जुड़े हुए हैं......मेरा तो कुछ ही महिनों का नाता है.........वैसे मैं हिन्दी टूल किट में काम करती हूँ जो रचनाकार पर उपलब्ध है और आसानी से डाउनलोड किया जा सकता है.........

    उत्तर देंहटाएं
  6. वीना जी,सत्यम जी उत्साह बढ़ाने के लिये धन्यवाद।
    सत्यम जी, चर्चा मंच पर मेरी कविता को स्थान देने के लिये आभार!

    उत्तर देंहटाएं
  7. मनुष्य नाम का प्राणी
    है बड़ा स्वार्थी,
    दर्द से डरता है, बड़ा घबराता है
    दूर भी होता है तो धीरे-धीरे।
    behad achchi kavita.

    उत्तर देंहटाएं
  8. उफ ये आदमी !
    किश्तों में जीने की आदत
    हो गयी है इसे,
    अब तो संबंध और प्रेम भी
    'इंस्टोलमेंट' में होते हैं।

    वाह..क्या खूब लिखा है ...

    उत्तर देंहटाएं
  9. मृदुला जी,वर्षा जी,बहुत-बहुत धन्यवाद अपनी प्रतिक्रियाओं से अवगत कराने के लिये । आपकी प्रतिक्रियाओं का हमेशा इंतज़ार रहेगा।

    उत्तर देंहटाएं
  10. मालिनी गौतम जी,

    हम भुलावे में जीते रहते हैं
    कि भूल रहे हैं किसी को
    और हो रहे दूर धीरे....धीरे,


    कविता एक अलग ही भाव-संसार में ले जाती हैं...
    बहुत ही गहरे भाव !
    ....बधाई !

    उत्तर देंहटाएं
  11. बहुत ही प्रभावशाली ढंग से रिश्ते पर रख दी हैं दिल की बातें!
    जारी रहें.
    -
    व्यस्त हूँ इन दिनों

    उत्तर देंहटाएं
  12. कविता की अंतिम कुछ पंक्तियाँ अपने में एहसासों का समंदर समेटे हुवे हैं.

    उत्तर देंहटाएं

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