रविवार, 13 मार्च 2011

गोविन्द मालव की कविता - एक ख्वाहिश

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दूर एक ख्वाहिश रह गयी दिल मेँ,
एक जान अनजान रह गयी तो क्या।


हजारोँ यादेँ साथ लेकर भी हम,
किसी को अपना न बना सके तो क्या।


लोगोँ की कारस्तानी दूर से नजर आयी,
हाल अपना सुधार न सके तो क्या।


वो खामोश ही रह गये जुबाँ से,
उन्हेँ फितरत पसन्द न आयी तो क्या।


चाहत की रोशनी मेँ मेरा धुंधला समाँ,
तकलीफ उन्हेँ समझ न आयी तो क्या।


कोशिश रही हरदम पास जाने की,
खुदा की रहमत न हुई तो क्या।


मासूम मिजाज है उनकी भोली अदाओँ का,
दीदार-ए-तन्हा न कर सके तो क्या।


एक ही आरजू रहती है दिल में,
जीने मेँ उनका साथ मिल जाये तो क्या।
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- गोविन्द मालव
पता - कवाई सालपुरा, बाराँ, राजस्थान
Email- govindkawai@gmail.com

2 blogger-facebook:

  1. एक ही आरजू रहती है दिल में,
    जीने मेँ उनका साथ मिल जाये तो क्या।

    सभी शेर एक से बढ़कर एक.....
    वाह! क्या खूबसूरत गजल कही है आपने !. ..........

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