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'अज्ञेय' की 100 वीं जयंती वर्ष पर प्रस्तुत है उनकी कुछ चुनिंदा कविताएँ -

(1)

वे पीट रहे हैं

तुम गोटें पीट रहे हो

वे कन्द-मूल खोद रहे हैं

तुम भाषा की जड़ें खोद रहे हो!

 

उन की घुटन में राम को पुकारा जाता है

और तुम्हारी घुटन में

राम को, हुक्काम को, इस-उस तमाम को

कागजी दंगल में पछाड़ा जाता है.

 

उनका हुलास

उन की सूखी फसल के साथ डूब गया है

 

तुम्हारा हुलास

तुम्हारे फिर-फिर भरते प्यालों के साथ ऊब गया है.

 

उनका दुख? वे छिपा सकते तो छिपा जाते

पर वह उन के चेहरे की झुर्रियों में अंका हुआ है.

तुम्हारा दुख? तुम छपा सको तो छपा लोगे

यों भी वह तुम्हारी आस्तीन पर टंका हुआ है.

 

वे जन हैं - जो अपने को नागरिक तक नहीं जानते

तुम नागरिक, नागर, जो अपने को जनकवि हो मानते!

--

(2)

बात को समझना

बड़ा आसान है.

चीजों पर

या तो लेबल लगे हैं

या नहीं लगे हैं.

अगर लगे हैं

तो वे बिकाऊ हैं,

उनके दाम जब किसी के होंगे

तब वे उस की होंगी

अगर नहीं है

तो वे पहले ही किसी की हैं

साहब, यह तो दूकान है.

 

(3)

ऊता रूता और जूता*

तीनों ने सम्मेलन आहूता

कमिटमेंट की आड़ में

पढ़ाई गई भाड़ में

खैर अब इसी में है बाप हो निपूता.

[* UTA, RUTA, JUTA - विभिन्न विश्वविद्यालयों के यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसियेशन के आद्याक्षर नाम]

 

(4)

बापू ने जब कहा,

'हमारे देश में दूध की नदियाँ

बहती थीं,'

तो मैंने

मन ही मन सोचा : बापू

नानी की कहानी सुना रहे हैं.

प्रत्यक्ष कुछ बोला नहीं.

 

मैंने जब कहा, 'देश में

दूध की तो नहीं, पर नदियाँ

बहती थीं, जिन में स्वच्छ नीला जल

लहराता था

जिस के पारदर्श तल में

पत्थर चमकते थे.'

तो बेटे ने सुना कर अपने

साथी से कहा, 'बापू अब

नानी की कहानी

दुहराने लायक हो गये हैं.'

 

अच्छा, बेटा, तुम जब अपनी

नहरों-नालियों की बात

याद कर के अपने

बेटे को सुनाओगे,

तब वह क्या कहेगा?

(या कि वह सुनने के पहले ही राय दे चुका होगा?)

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(अन्तरा, राजपाल एंड संस, कश्मीरी गेट दिल्ली  से साभार.)

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