सोमवार, 14 मार्च 2011

यशवन्‍त कोठारी का व्यंग्य आलेख - उपभोक्ता आंदोलन उर्फ एक विलाप और

कल सायंकाल मुझे एक गोष्‍ठी में जाना पड़ा। ‘पड़ा' शब्‍द इसलिए प्रयुक्‍त कर रहा हूँ कि श्रोताओं की कमी के कारण आयोजक महोदय वाहन लेकर स्‍वयं हाजिर हो गये थे। और वैसे भी दैनिक पत्र में नियमित लिखने का एक लाभ ये भी है। खैर।

गोष्‍ठी का विषय था- उपभोक्‍ता आन्‍दोलन में बुद्धिजीवी की भूमिका। दो चार सेवा निवृत अधिकारी और प्रोफेसर थे, एक अदद अध्‍यक्ष, एक संयोजक और संस्‍था के अध्‍यक्ष, सचिव के अलावा श्रोताओं के रूप में हम दो या तीन व्‍यक्‍ति थे।

पूरा तामझाम शानदार। हाल, दो इंच गहरा कालीन और चमड़े का शानदार सोफा, बहुत ही नफीस कुर्सियां, कुल मिलाकर बिलकुल एक आडम्‍बरी आयोजन, विद्वान लोग और कम अक्‍ल के श्रोता। चाय-पान का शानदार आयोजन, चपरासी, घंटी बिजली की रोशनी। पूरा आभिजात्‍य और आंग्‍ल भाषा का एलीट वर्गीय उच्‍चारण। इस आतंकित करते माहौल में मैं पूर्णतया मिसफिट था, लेकिन बीच में उठना पूर्णतया असभ्‍यता थी, सो मैं इन वक्‍ताओं को झेलने को बाध्‍य था।

एक बुद्धिमान वक्‍ता ने नकली दवाओं की बात उठाई, वे बार-बार घटिया दवाओं, डॉक्‍टरों के कमीशन, विभिन्‍न प्रकार के टेस्‍टों का रोना रो रहे थे। बाद में पता चला कि वे स्‍वयं काफी अर्से से बीमार चल रहे थे। एक अन्‍य वक्‍ता ने बुद्धिजीवियों द्वारा फैलाये जा रहे उपभोक्‍ता आन्‍दोलन की ओर ध्‍यान खींचा। इन सज्‍जन का विचार था कि यदि एक ठेले वाला एक किलो के स्‍थान पर आठ सौ ग्राम वस्‍तु तोल कर देता है या धनिये में घोड़े की लीद मिलाता है तो ये बहुत बड़ा शोषण नहीं है, लेकिन यदि एक इंजीनियर एक पुल के निर्माण में पांच लाख रुपया खा जाता है तो यह एक बड़ा उपभोक्‍ता शोषण है। बात सही थी लेकिन अध्‍यक्ष महोदय स्‍वयं एक भूतपूर्व इंजीनियर थे, अतः उन्‍होंने इस बात का विरोध करते हुए कहा - यह प्रश्‍न भ्रष्‍टाचार का मामला है, अतः इसे छोड़ देना चाहिए। अध्‍यक्ष की बात कौन टालता, क्‍योंकि गोष्‍ठी उनके निवास स्‍थान पर थी।

आखिर उपभोक्‍ता आंदोलन में उपभोक्‍ता की क्‍या स्‍थिति है ? यह प्रश्‍न एक शोध छात्र का था। उनके इस प्रश्‍न का जवाब आसानी से आया।

जो किसी भी वस्‍तु का उपभोग करे वह उपभोक्‍ता हैं लेकिन खाने-पीने अलावा भी तो भोग्‍य वस्‍तुएं हैं।

वो तो ठीक है, लेकिन हमारा आंदोलन मुख्‍य रूप से इडीबल कमोडीटीज के लिए ही है।

इतनी-सी देर में शानदार टी सेटों में चाय और ट्रे में नाश्‍ता आ गया। शहर का जाना माना बुद्धिजीवी तबका चाय नाश्‍ते पर टूट पड़ा क्‍योंकि आंदोलन पर अभी और भी विचार होना था। बुद्धिजीवी अब नाश्‍ताजीवी और चायजीवी हो गया था। चाय नाश्‍ते के सात्‍विक कर्म से निपटने के बाद बहस को वापस आम आदमी, आम उपभोक्‍ता, कमोडिटी, डिमाण्‍ड, सप्‍लाई आदि भारी शब्‍दों की ओर लाया गया। एक सज्‍जन ने दास कैपिटल, कार्लमार्क्‍स, लेनिन, लोहिया जैसी भारी भरकम शब्‍द हवा में उछाले परिणाम स्‍वरूप एक श्रोता उठकर चला गया।

चपरासी बीड़ी पीने लग गया। महिलाओं ने अपना मेकअप ठीक करना शुरू कर दिया। और मैं उबासी लेने लग गया। उपभोक्‍ता संरक्षण और विकास, शोध और योजना के लिए सरकार को आड़े हाथों लिया जाने लगा, तो सरकारी प्रतिनिधि का जवाब था --

सरकार क्‍या करे, हम सब की सामूहिक जिम्‍मेदारी है। एक समाजवादी सदस्‍य ने प्रतिवाद करते हुए कहा -- सरकार ही एडल्‍ट्रेटेड है।

क्‍या बदतमीज़ी है। अफसर ने ललकारा।

समाजवादी सदस्‍य भी खड़े हो गये। बातचीत तू-तू, मैं-मैं तक आ गई। कई सदस्‍य एक साथ बोलने लगे गये, शोर शराबा हुआ। शायद एकाध कप भी टूट गया। गोष्‍ठी बुद्धिजीवी से शरीरजीवी बन गई। आयोजक, अन्‍धेरे का लाभ उठाते हुए गायब हो गये। बेचारा उपभोक्‍ता कमर तोड़ महंगाई की मार से और ज्‍यादा कुबड़ा हो गया। कुल मिलाकर स्‍थिति वही है, जो शायर ने बयान की है

अब तो इस तालाब का पानी बदल डालों यारों।

ये कमल अब कुम्‍हलाने लगे हैं ॥

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यशवन्‍त कोठारी

86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर,

जयपुर-302002 फोनः-2670596

ykkothari3@gmail.com

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