शुक्रवार, 18 मार्च 2011

रामदीन की होली विशेष रम्य रचना - सोन चिरैया चहके छत पर भाभी हैं मुंहबोली, देखो खेल रहे हैं होली।

happy holi

होली'

खेल रहे हैं होली

गदरानी जहाँ फसलें राधा मोहन बने किसान

और निकट आ गये दुबारा मन में ले अरमान

पनघट गीता आँगन भीगा डाल पे कोयल बोली

हंसिया पिचकारी सा चमके खड़ी फसल ज्‍यों चोली, देखो खेल रहे हैं होली।

 

टटकी ताजी फसलें राधा तनकर भई जवान

मौका ताके आलिंगन का कान्‍हा बनो किसान

उड़े गुलाल नदी के तीरे पगडंडी भई लाली

सोन चिरैया चहके छत पर भाभी हैं मुंहबोली, देखो खेल रहे हैं होली।

 

रसिया फाग अगर जो देखे चलों गॉव की ओर

मदमाती जहाँ फसलें राधा कृषक हैं माखन चोर

दबा बोझ से जाय किसनवा पैर फिसलता अध रस्‍ते

राधा की चूनर ज्‍यों सरके खुल जाये पायल अध रस्‍ते

अमवा की डरिया पर कूकै कोयल काली काली

भंवरा चूमें बनकर मनमथ मटक रही मतवाली

गेंहूँ की बाली को चूमें झुककर पीली सरसों

मिलजुल होली आज मना लें क्या रखा है परसों

आओ बहुरि हियां पर लाला बनकर फिर हमजोली, देखो खेल रहें हैं होली।

 

बजे नगाड़ा चबूतरों पर खलिहानों में ढोल

दो मदमाते मस्‍त हुए फिर मिलकर करें किलोल

भोर भुरहरे गलियारों में मस्‍त चली पुरवाई

उसी वक्‍त मोहन किसान को राधा की सुध आई

सुधि बिसरा कर सारे जग की मिल गये दोनों जान

गलबहियाँ दोनों कर बैठे बीच खेत दरम्‍यान

जनम जनम के साथी दोनों मिलकर करें ठिठोली, देखो खेल रहें हैं होली।

 

देत असीस बड़े बूढ़े सब रहे सलामत जोड़ी

फूलें फलें सदा ऐसे ही नजर न लगे निगोड़ी।

सेंकें गुझिया खायें गुलगुला मस्‍त मनाये होली, देखो खेल रहे हैं होली।

 

-रामदीन

जे-431, इन्‍द्रलोक कालोनी

कृष्‍णा नगर, कानपुर रोड,

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