शनिवार, 19 मार्च 2011

सुरेन्द्र अग्निहोत्री की होली विशेष रचनाएँ - फागुन में खिल उठा गोरी तेरा रंग

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फागुन में खिल उठा गोरी तेरा रंग

आमों की अमराई में सपनों की जंग

 

मन मयूर सा नाचता लेकर खूब हिलोर

गोरी तुमने आने में क्‍यों कर दी भोर

 

मन्‍द-मन्‍द सी वह रही सुखमय सुवास

हौले से आ गया यह फागुनी मधुमास

 

माहुर, विछुवा चमके तो करधनिया

खोजत फिर रही अपना तो सांवरिया

 

आंगन में चटक गयी है धूप

दर्पण में देख रही क्‍यों रूप

 

फागुन की मस्‍ती में अधर हुए लाल

प्रेमी लेकर आ गया रंग ओर गुलाल

---

 

त्रतुराज बंसत लाया प्‍यारा ख्‍वाब,

फूले टेसू लग रहे हैं तो महताब।

 

आगंन में चटक गयी गहरी धूप,

देह कंचन हुई क्‍यों न देखू रुप।

 

हाथ सजाते पिचकारी रंग के थाल,

इन्‍द्रधनुषी रंग से अधर करेगें लाल।

 

प्रेमी लेकर आ गया रंग बहुत अनमोल,

रंगो के संग अंगो से करती किल्‍लोल

 

तन मन होली में हुआ टेसू का फूल

कोयल कूं-कूं गा रही मन के अनुकूल

 

आमों की अमराई में रंगों की बौछार

प्रियतम कर रहे प्रणय की मनुहार

--

 

होली

मौसम मस्‍त हुआ,

सभी हुए खुशहाल।

 

होली के हुड़दंग में,

उड़ी खूब गुलाल।

 

टेसू से रंग बना,

पीला और लाल।

 

होली रंग से खेल लो,

रहे न कोई मलाल।

 

हया शर्म को छोड़कर

अधर करो तुम लाल

 

रंगों के रस रंग में

रखना यही ख्‍याल

 

कर लो दिल की बात

चलो न कोई चाल

 

होली फिर आयेगी

अब तो अगली साल।

 

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सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री

राजसदन-120/132

बेलदारीलेन लालबाग,

लखनऊ

1 blogger-facebook:

  1. तीनो रचनाये अच्छी है .......
    आपको होली की शुभकामनाये

    उत्तर देंहटाएं

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