सोमवार, 21 मार्च 2011

बर्तोल्त ब्रेख्त की कविता - औरत के बारे में एक गीत

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औरत के बारे में एक गीत

1

मैं जानता हूँ प्रेयसियो

अपने बेतरतीब जीवन के कारण

झड़ रहे हैं मेरे बाल और

सोता हूँ मैं पत्थरों पर

देखती हो तुम मुझे घटिया शराब पीते हुए

और हवा में चलता हूँ मैं निर्वस्त्र

2

लेकिन एक वस्तु था प्रेयसियो

जब निर्मल था मैं

3

मेरे पास एक औरत थी वह मुझ से भी

ताकतवर थी जैसे कि घास ताकतवर होती है

एक साण्ड से, वह दोबारा उठ खड़ी होती है

4

उसने देखा कि मैं दुश्चरित्र हूँ और प्यार किया मुझे

5

उसने नहीं पूछा रास्ता किधर जाता है

जो कि उसका रास्ता था और जो शायद

घाटी की ओर जाता था । उसने अपना

जिस्म दिया और बोली ‘यही कुछ है’

और बन गया उसका जिस्म मेरा जिस्म

6

अब कहीं नहीं हे वह बारिश के बाद के

बादल की मानिन्द वह लुप्त हो गयी

मैंने जाने दिया उसे ओर बढ़ी वह

घाटी की ओर क्योंकि वही उसका रास्ता था

7

लेकिन रातों को कभी कभार, जब देखो

तुम मुझे पीते हुए, देखता हूँ मैं उसका

चेहरा हवा में निस्तेज पड़ा, मजबूत

और मेरी ओर मुखातिब. और

हवा में मैं उसके समक्ष नतमस्तक

होता हूँ

---

अनुवाद – नरेन्द्र जैन

रचनासमय अप्रैल 2009 से साभार

4 blogger-facebook:

  1. बहुत अच्छी कविता पढ़वाई आपने। इस कविता के इस अंश ने मुझे अधिक प्रभाविता किया..

    उसने नहीं पूछा रास्ता किधर जाता है
    जो कि उसका रास्ता था और जो शायद
    घाटी की ओर जाता था । उसने अपना
    जिस्म दिया और बोली ‘यही कुछ है’
    और बन गया उसका जिस्म मेरा जिस्म
    ....सदियों का सच है यह। लेकिन अब हालात सुधर रहे हैं।

    उत्तर देंहटाएं

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