बुधवार, 23 मार्च 2011

अशोक गौतम का व्यंग्य : संकटमोचक भी अब हारो!

यों ही सोचा जैसे अकसर सोचा करता हूं कि वे आए हैं तो मेरे संकट हरने ही आए होंगे।

सच कहूं जबसे होश संभाला है तबसे संकटों से ही दो चार होता रहा हूं। कभी घर में आटे का संकट तो कभी दाल का संकट। कभी बेटे को अच्‍छे स्‍कूल में दाखिल करवाने का संकट तो कभी उसकी हर हफ्‌ते ट्‌यूशन फीस का संकट। मैं तो बस औरों के ही संकटों को आजतक झेलता रहा। अपने संकटों को गंभीरता से लेने का कम्‍बख्‍त मौका ही नहीं मिला। अब देखो न! बीस बरसों से दिमाग चाटती बीवी के संकट को लगातार झेल रहा हूं। कई बार इस संकट से खुद को उबारने की कोषिष भी की! पर जितने को कुछ करने की सोचने लगा कि दूसरा ही संकट मुंह के पास मुंह लटकाए खड़ा हो गया। कुल मिलाकर ,कभी ये संकट तो कभी वो संकट। ऐसे में मेरी जगह आप होते तो सपने में पूर्व प्रेमिकाओं के बदले संकट मोचकों के ही दर्शन किया करते मेरी तरह।

मैंने उन्‍हें प्रणाम किया,‘ हे संकट मोचक प्रणाम! आप हो तो संकट मोचक ही पर किसके संकट मोचक हो? यूपीए के ,एनडीए के या फिर चारों ओर से संकटों में घिरी जनता के! जिसके आगे यूपीए है तो पीछे एनडीए। दाएं कम्‍युनिस्‍ट हैं तो बाएं समाजवादी! न वह आगे ही जा सकती है न ही पीछे। न दाएं न बाएं! चारों ओर खाइयां ही खाइयां ,' तो वे मेरी ओर से बेरूखे हो बोले,‘ मैं यहां जनता के संकटों को हरने नहीं आया हूं,' तो मैंने पुनः हाथ जोड़े पूछा,‘ तो प्रभु! किसका संकट हरने आए हो? यूपीए पर आया संकट तो खत्‍म हो गया ! करूणानिधि ने समर्थन वापस लेने की धमकी के बाद दुम दबाए अपनी धमकी वापस ले ली। बेचारे मुलायम अपना उस्‍तरा पैना करते ही रह गए,' तो वे दोनों हाथों में अपन सिर थाम अपनी गदा मेरे हाथ में थमा बोले,‘ क्‍या बताऊं यार! मैं तो खुद ही संकट में फंसा हूं!'

‘ आप और संकट! सरकार तो हमसे चौबीसों घंटे मजाक करती ही रहती है अब आप भी क्‍यों हमसे मजाक करने लगे? जनता मांइड नहीं करेगी क्‍योंकि उसके पास माइंड है ही कहां! हमारे संकट नहीं हरने तो सीधे से इंकार कर दो । वैसे भी आजतक संकटमोचक सत्‍ता के ही हुए हैं, जनता के भाग में तो बस संकट ही संकट बदा है, ' मेरे कहते ही उन्‍होंने मेरा सहारा ले कहा,‘ बस यार! बहुत कह दिया तूने। पर सच ये है कि मैं राम रावण वार के समय से ही उन बाबुओं के चक्‍कर में फंसा हूं जिनकी सुर नर मुनि आरती उतारे, जय जय जय बाबू उचारे! भूत पिसाच सब मौज मनाए, बाबू को जब डटके खिलाए!!'

‘बाबुओं के चक्‍कर में और आप!' मुझे लगा मैं पागल न हो जाऊं तो वे दीन हीन हो बोले,' हां यार! राम रावण का युद्ध हुआ था तो उसमें लक्ष्‍मण मूर्छित हुए थे कि नहीं?'

‘हां तो!!' मैंने अपने से लंबी सांस भरी तो वे मुझसे भी लंबी सांस भर बोले,‘तब सरकार के आदेश से मैं संजीवनी लाने हिमालय चला गया। वे बोले आधिकारिक अनुमति बाद में ले लेना। अभी लक्ष्‍मण का सवाल है। प्रजा का होता तो सोचने को वक्‍त मिल जाता। और मैं कार्यालय आदेशों की परवाह किए बिना संजीवनी लेने जा निकला। रास्‍ते का सारा खर्चा अपनी जेब से किया। सरकार को खतरा जो था,‘ कह उनकी आंखों में आंसू से आए तो मैंने पूछा,‘ बाद में तो सब मिल गया होगा?'

‘कहां यार! आज तक मेरा बिल नहीं निकल पाया। वो विद्या सिंह बाबू है कि बिल में कभी ये आब्‍जेक्‍शन लगा देता है तो कभी वो। कभी कहता है कि उड़नखटोले से यात्रा की तुम्‍हारी पात्रता नहीं थी, तो कभी कह टाल देता है कि टूअर डायरी अपने बास से प्रापरली हस्‍ताक्षरित करवा कर लाओ। बिल में कभी ये कमी तो कभी वो कमी! बस , उसी बिल के चक्‍कर में जब मौका मिलता है बाबू के पास आ लेता हूं। साला अपने आप सारा दफ्‌तर डकार गया। पर उसे पूछने वाला कौन,' मुझे काटो तो खून नहीं,‘सरकारी काम से ही तो गए थे न!आज के अफसरों की तरह तो नहीं कि बनाते हैं सरकारी काम से टूअर और गए होते हैं प्रेमिका के साथ मस्‍ती करने। घरवाली घर में सड़ती रहे तो सड़ती रहे। जनाब से बात नहीं की इस बारे में?' तो वे लंका तक उदास होते बोले,‘ उनसे क्‍या बात करूं! वे तो बेचारे खुद ही अपनी भूमि पर उपजे विवाद को लेकर परेशान हैं। तुम्‍हारे उस बाबू से लिंक हो तो मेरा काम निकलवा दो प्‍लीज!'

--

 

अशोक गौतम

गौतम निवास, अपर सेरी रेाड,

सोलन-713212

1 blogger-facebook:

  1. संकट मोचन को भी तलाश है एक और hanu man की ...

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------