गुरुवार, 24 मार्च 2011

गंगा प्रसाद शर्मा 'गुणशेखर' के दोहे : बड़े-बड़ों की होलिका, कपड़े रही उतार..

तारकोल, कीचड़ सने, चेहरे रूप-कुरूप.
होली में सब एक-से, रंक, भिखारी, भूप..

धो सकती है होलिका, सबके मन का मैल.
पर धुलने की क्या कहें, और रहा है फैल..


मन के प्यारे खेल को, रहे देह से खेल.

सारी कुंठा, वासना, ऐसे रहे उंडेल...


चाहे कपड़े नए हों, या अनगिन पकवान.
सब के सब फीके लगें, बिना प्यार, सम्मान..


होली में ऐसे हुए, तन-मन चंग-मृदंग.

बजते-बजते, ताल, लय, सारे हो गए भंग..

 

छलिया, रसिया राग के, झोली भर-भर रंग.
होली मिलने चल पड़े, कलिकाओं से भृंग..


वासन्ती परिधान में, खिला अंग-प्रत्यंग.
सरसों ने फेरे लिए, फिर गेहूं के संग..


लाने को नव सभ्यता, और नए संस्कार.
बड़ों -बड़ों की होलिका, कपड़े रही उतार..

           -डॉक्टर गंगा प्रसाद शर्मा 'गुणशेखर'

1 blogger-facebook:

  1. बहुत सुन्दर दोहे ... आपके ब्लॉग से ४ पोस्ट कल की ..आज चर्चामंच मे हैं.. आप वहाँ आ कर अपने विचारों से अनुग्रहित कीजिये ..
    http://charchamanch.blogspot.com/2011/03/blog-post_25.html

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------