शुक्रवार, 25 मार्च 2011

लक्ष्मीकांत की ग़ज़ल - झुलस रहा है जिगर सर्द चांदनी में

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ग़ज़ल

000

हज़ार ज़हमतें हैं यार ज़िन्‍दगी में

तमाम ग़म भी छुपे रहते हैं खुशी में

 

लुका-छुपी का खेल खेलते रहे हरदम

कभी तो आ के मिलो मुझसे रोशनी में

 

निजाम बेलगाम होने लगा है जब से

उबाल आने लगा आम आदमी में

 

खुदा मुझे भी ज़रा दाँव-पेंच सिखला दे

वरना जी न सकूंगा मैं इस सदी में

 

तुम्‍हारे गाँव का मौसम अजीब है हमदम!

झुलस रहा है जिगर सर्द चांदनी में

 

000

लक्ष्‍मीकांत

14/260, इंदिरा नगर,लखनऊ।

4 blogger-facebook:

  1. झुलस रहा है जिगर सर्द चांदनी में ???

    jigar ?? jism hoga shaayad...

    jigar kaise jhulas sakta hai yaar ???

    उत्तर देंहटाएं
  2. अरे नीरज जी, जुदाई का गम गलत करने के नाम पर 'नीट' पीने वालों से पूछिए कि जिगर कैसे झुलसता, जलता और अंत में तंदूर बनकर राख हो जाता है! :)

    उत्तर देंहटाएं
  3. aap sahee hain!...yahee shach hai.filhal itna hee...'' vagarna '' hai, n ki '' varna '' laxmi Kant.

    उत्तर देंहटाएं

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