शनिवार, 26 मार्च 2011

सुरेन्द्र अग्निहोत्री की कविता - रोशनी एक वहम...

रोशनी.......एक वहम!

सिर्फ अंधेरा..... कई रंगों, कई रूपों में

जी हाँ सिनेमा का यही रूप है।

सिनेमाई सरोकार की अनूठी पहल

गंदामी रंग के कपड़े पहने

कचरे के ढ़ेर बीच बुनते सपने

सुबह का उजाला एक ना एक दिन

आयेगा मेरे घर - आंगन

जब दूसरों की तरह पढ़ने में जाऊंगा

थियेटर में फिल्‍म, बाजार में खाना खाऊंगा

बच्‍चों की यह अभिलाषा

पूरी करने कौन गढ़ेगा परिभाषा।

--

 

सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री

राज सदन, 120/132, बेलदारी लेन लालबाग लखनऊ

5 blogger-facebook:

  1. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (28-3-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुबह का उजाला एक ना एक दिन

    आयेगा मेरे घर - आंगन

    जब दूसरों की तरह पढ़ने में जाऊंगा

    Beautiful !

    .

    उत्तर देंहटाएं
  3. सामाजिक सरोकारों से प्रेरित यह अनूठी रचना बहुत पसंद आई ! काश ऐसी सुबह सबके जीवन में जल्दी से आये ! मेरी बधाई स्वीकार करें !

    उत्तर देंहटाएं

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