रविवार, 27 मार्च 2011

गंगा प्रसाद शर्मा 'गुणशेखर' की रचनाएँ

टूट गया बंजारा मन
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माना रिश्ता जिनसे दिल का

दे बैठा मैं तिनका-तिनका

 

दिल के दर्द,कथाएँ सारी
रहा सुनाता बारी-बारी


सुनते थे ज्यों गूँगे-बहरे
कुछ उथले कुछ काफी गहरे


मतलब सधा,चलाया घन.
टूट गया बंजारा मन.


भाषा मधुर शहद में घोली
जिनकी थी अमृतमय बोली


दाएँ में ले तीर-कमान
बाएँ हाथ से खींचे कान


बदल गए आचार-विचार
दुश्मन-सा सारा व्यवहार


उजड़ा देख के मानस-वन.
टूट गया बंजारा मन.

जिस दुनिया से यारी की
उसने ही गद्दारी की


लगा कि गलती भारी की
फिर सोचा खुद्दारी की


धृतराष्ट्र की बाँहों में
शेष बची कुछ आहों में


किसने लूटा अपनापन.
टूट गया बंजारा मन.


कैसे अपना गैर हो गया
क्योंकर इतना बैर हो गया


क्या सचमुच वो अपना था
या फिर कोई सपना था


अपनापन गंगा-जल है
जहाँ न कोई छल-बल है


ईर्ष्या से कलुषित जीवन.
टूट गया बंजारा मन.


वे रिश्तों के कच्चे धागे
आसानी से तोड़ के भागे


मेरे जीवन-पल अनमोल
वे कंचों से रहे हैं तोल


छूट रहे जो पीछे-आगे
जोड़ रहा मैं टूटे धागे


उधड़ न जाए फिर सीवन.
टूट रहा बंजारा मन.


बाहर भरे शिकारी जाने
लाख मनाऊँ पर ना माने


अनुभव हीन, चपल चितवन
उछल रहा है वन-उपवन


'नाद रीझ' दे देगा जीवन

यह मृगछौना मेरा मन


विष-बुझे तीर की है कसकन.
टूट गया बंजारा मन.


 

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सारे भेद भुलाती होली
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जाति, धर्म, भाषाएँ, बोली
सारे भेद भुलाती होली


रंग -बिरंगे कपड़े पहने
आती प्यार लुटाती होली


घर-आँगन बगिया बौराने
काम के बान चलाती होली


सारा रंग - भंग कर देती
जब-जब है फगुनाती होली


झोली भर-भर प्यार गुलाबी
जग को रही लुटाती होली


हर दिल के अंकुरित प्यार को
आती आग लगाती होली


मन का भारी मैल हटाके
दुश्मन, दोस्त बनाती होली

ले कर-कर में कुंकुम रोली
सबको गले लगाती होली


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इम्तिहान के दिन जब आते
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पूरे साल मटरगस्ती की
धमाचौकड़ी औ मस्ती की

गृह कार्य या कक्षा कार्य
ऐच्छिक हो या अनिवार्य 

मानी नहीं किसी की शिक्षा
तभी है भारी पड़ी परीक्षा।

 

दादा-दादी, नाना-नानी
सबको पड़ती व्यथा सुनानी

चाहे जैसे इनको पढ़ते
सारे विषय कठिन है लगते।

 

इम्तिहान के दिन जब आते
सभी पुजारी हैं बन जाते

मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारे  
लगते सभी जियावनहारे

प्रभु से माँग रहे सब भिक्षा
पास कराऔ कठिन परीक्षा। 

 

शिक्षिकाएँ औ शिक्षक सारे
पढ़ा-पढ़ा के जिनको हारे

कुछ होते हैं बहुत पढ़ाकू   
और शेष सब बड़े लड़ाकू

व्यर्थ गई सब जिनकी दीक्षा 
उनको भारी  पड़ी परीक्षा।

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डॉक्टर गंगा प्रसाद शर्मा

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