सतीश चन्द्र श्रीवास्तव की कविताएँ - बच्चा

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कविताएं

बच्चा

१.

कल मैंने अपने बच्चे को

पीट दिया,

क्योंकि मैं नहीं चाहता ,

वह बाहर की मेरी दुनिया देखे

और पूछे ऐसे सवाल

जिनसे मैं बचना चाहता हूँ ।

२.

खूँटी पर

अपना कोट टाँग कर,

वे ज़ेब को टटोलते है

और चल देते है ,

उनका बच्चा सूनी निगाहों से

टटोलता है उनका मन,

बच्चे की निगाहों में

उठता है एक द्वंद ,

कोट

आखिर उसकी पहुँच से दूर क्यों है ।

३.

बच्चे देश के कर्णधार है

नहीं,

बच्चे चन्द लोगों के आहार है

फुटपाथों पर नंग धड़ंग सोते बच्चे ,

प्लेटफार्म पर भीख माँगते बच्चे

या चाय की दुकान पर,

दिखलायी पड़ जाते हैं अक्सर,

बच्चे जिन्हें पीने को दूध नहीं मिलता

दूध के डिब्बे पर बने

फोटो को देखते है और खुश हो लेते हैं ।

सिगरेट के टुकड़ों को पीते हुए,

जीवन को टुकड़ों में जीते हुए,

ज़िन्दगी के ज़हर को पीते हुए

जीते है बच्चे ।

बच्चे,

जिनके कन्धों पर टिका है

देश का भार,

शिक्षा के नाम पर सीखते है रोज

अपने मालिक से गालियाँ ।

बच्चे को यह सब अच्छा नहीं लगता

पर बच्चा चुप है, शांत है,

क्योंकि वह देश का कर्णधार है ।

४.

बच्चा,

चला जा रहा है स्कूल

बस्ते के बोझ से बेखबर,

जाते हुए बच्चे को देख कर

माँ को है उम्मीद,

बस्ते की कब्र से निकलेगा

शायद डाक्टर या शायद इंजीनियर ।

५.

बच्चे ने कहा,

तुम भी कितने अज़ीब हो पापा,

बच्चा भी कहते हो मुझे

और कहते हो ज़िद मत करो ।

६.

दो बच्चे है मेरे,

बड़ा है जो नाम रखा ईमानचंद

और छोटे का दौलतचंद ।

कुदरत का करिश्मा कहिए

या उसकी मार,

छोटे का कद, बड़े से बड़ा हो गया

और बड़ा छोटे से भी छोटा रह गया ।

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सतीश चन्द्र श्रीवास्तव

५/२ ए रामानन्द नगर

अल्लापुर, इलाहाबाद

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2 टिप्पणियाँ "सतीश चन्द्र श्रीवास्तव की कविताएँ - बच्चा"

  1. बच्चे ने कहा,
    तुम भी कितने अज़ीब हो पापा,
    बच्चा भी कहते हो मुझे
    और कहते हो ज़िद मत करो ।

    सभी क्षणिकाएं बहुत अच्छी हैं....एक से एक
    बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  2. amita5:47 am

    बच्चा,
    चला जा रहा है स्कूल
    बस्ते के बोझ से बेखबर,
    जाते हुए बच्चे को देख कर
    माँ को है उम्मीद,
    बस्ते की कब्र से निकलेगा
    शायद डाक्टर या शायद इंजीनियर

    बहुत सुंदर क्षणिकाएँ हैं
    बधाई अमिता

    उत्तर देंहटाएं

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