बुधवार, 30 मार्च 2011

सुमित शर्मा की कविता - बचपन

sumit sharma

बचपन

रेत गिट्टी,

ईंट मिट्टी,

और तपती धूप तले,

झुलसता हुआ

बचपन कोई मैं देखता हूँ।

 

सावन मनभावन,

निर्मल जल पावन,

और किसी टूटी टपरिया तले,

भीगता हुआ

बचपन कोई मैं देखता हूँ।

 

शरद अनवरत,

शीतलहर लेती लपट,

और किसी फटे चिथड़े तले,

सिकुड़ता हुआ

बचपन कोई मैं देखता हूँ।

 

बसंत मनपसंद,

हरदम ही आनंद,

और आधे नग्‍न बदन में,

फूल बीनता हुआ

बचपन कोई मैं देखता हूँ।

 

मुस्‍कुराता हरदम,

बदले चाहे मौसम,

और पनपता, और उन्‍नत,

खुशहाल बचपन का कोई

स्‍वप्‍न वही मैं देखता हूँ।

 

सुमित शर्मा, खिलचीपुर,जिला-राजगढ़ (म.प्र.)

8 blogger-facebook:

  1. खुशहाल बचपन का कोई

    स्‍वप्‍न वही मैं देखता हूँ।

    सुन्‍दर भावमय करते शब्‍द ...।

    उत्तर देंहटाएं
  2. इस प्रकार के बचपन का सुन्दर चित्रण. आपको बधाई एवं शुभकामनाएं

    उत्तर देंहटाएं
  3. इस प्रकार के बचपन का सुन्दर चित्रण. आपको बधाई एवं शुभकामनाएं

    उत्तर देंहटाएं
  4. इस प्रकार के बचपन का सुन्दर चित्रण. आपको बधाई एवं शुभकामनाएं

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत अच्छे .. लगे रहो..

    उत्तर देंहटाएं

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