गुरुवार, 24 मार्च 2011

आर. के. भारद्वाज की लघुकथाएँ

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विकास

जिस बस्‍ती में मैने अपना झोंपड़ा बनाया है वह अभी विकास की भ्रूण अवस्‍था में है, न बिजली-पानी, न नाली न सड़कें, न फोन, न सीवर लाइन, लेकिन मुझे विश्‍वास था कि यह बस्‍ती जल्‍द ही न केवल विकास की यौवनावस्‍था को प्राप्‍त होगी बल्‍कि वृद्धा अवस्‍था को भी प्राप्‍त होगी, फिर एक दिन मेरी बस्‍ती में सड़कें बननी शुरू हो गयी, पहले कच्‍ची, फिर रोडियॉ पड़नी शुरू हुई, उसके बाद डामर की पक्‍की सड़क बन कर तैयार हो गई, एक सप्‍ताह के बाद नाली बनाने वाले आ गये, उन्‍होंने नाली बनाई, पक्‍की बनाई, बढ़िया बनाई, बेतरतीब बनाई, नाली की मिट्‌टी ने सड़क को अपने गले लगा लिया, उसके बाद आए पानी के पाइप बिछाने वाले, बिजली वाले, उन्‍होंने जगह जगह से सड़क को काटकर अपना काम किया, बडे बडे गड्ढों में सीमेन्‍ट के पाइप डाल कर खड़े किये, एक साल के बाद छोटे छोटे बल्‍ब जलने लगे। इसके बाद ट्रकों में लदकर बड़े बड़े पाइप आये और उन्‍हें सड़कों के किनारे किनारे डाल दिया गया अब सीवर लाइन खुदने की बारी थी, कुछ दिन बाद सीवर लाइन वालों ने सड़क की मांग को बीच से उजाड़ना शुरू कर दिया, जब कि बस्‍ती अपनी नवयौवना अवस्‍था में थी, सीवर लाइन वाले अपना काम करके चले गये। अब सीवर लाइन बनी हुई दीख रही थी, सड़कें नाली तो पहले ही बन चुकी थी।

अब मेरी बस्‍ती का पूरा विकास हो चुका है।

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पूजा घर

मॉ बाप, चार बेटे, चार कमरों का मकान, मॉ बडी खुश थी, उसने एक कमरे में पूजा घर बना लिया। एक बच्‍चों को दे दिया, एक कमरे में पति पत्‍नी और एक बैठक। मॉ का सब कामों में सबसे प्रिय काम था उसका पूजा करना, रोज अपने हाथों से उसे सजाती, संवारती, ठाकुर जी को नहलाती, फूल-धूप बत्‍ती से पूजा करती, लेकिन करती तब, जब घर के सारे काम सिमट जाते, कभी गीता का पाठ करती, कभी रामायण, कभी शिव पुराण, कभी भागवत, उसे इस काम में एक निर्मल शान्‍ति प्राप्‍त होती। किसी को किसी से कोई शिकायत नहीं थी। समय गुजरता गया,पहले बडे बेटे की शादी हुई उसे बैठक वाला कमरा दे दिया गया, फिर उससे छोटे की शादी हुई उसे भी एक कमरा दे दिया गया, फिर तीसरे बेटे की शादी पर एक कमरा उसे दे दिया गया । पूजा और बाकी सदस्‍य एक कमरे में सिमट गये, चौथे बेटे की शादी पर वह कमरा उसे दे दिया गया और पति-पत्‍नी ने बरामदे में अपनी अपनी चारपाई डाल ली। आजकल मां स्‍नान घर के एक कोने में अपने भगवान को जगह दे पाई, उसकी पूजा अभी भी जारी है। मां को किसी से अब भी शिकायत नहीं है।

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RK Bhardwaj

151/1 Teachers Colony, Govind Garh]

Dehradun (Uttarakhand)

email:  rkantbhardwaj@gmail.com

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