सोमवार, 7 मार्च 2011

नमन दत्त साबिर के गीत व गजल

naman

गीत

सावन के अनुबंध...

नयन संग सावन के अनुबंध.....

रिश्तों की ये तपन कर गई, मन मर्यादा भंग,

हल्दी, सेंदुर,माहुर, हम, तुम, कितने प्राकृत रंग,

जीवन के बंधन सारे यूँ आज हुए स्वच्छंद ......

नयन संग सावन के अनुबंध...

तुम और मुझ से हम तक आते, सदियाँ बीत गईं,

अब कैसा खोना-पाना, जब सांसें रीत गईं, 

फूल, सितारे, ख़ुशबू, तुम, हम- जीवन के छलछंद ....

नयन संग सावन के अनुबंध...

 

ग़ज़ल


क्या बतलायें कैसे गुज़र की.

रोते रोते उम्र बसर की.

 

टूट गए पैमाने अक्सर,

तूने जब भी एक नज़र की.

 

बयाँ कर रहीं एक सानिहा,

गालियाँ इस वीरान शहर की.

 

आज हर इक तूफ़ाँ के लब पर,

बातें हैं उस एक लहर की.

 

अमृत था पानी जिसका, वो –

नदी बन गई एक ज़हर की.

 

रात कह रही चीख़-चीख़ के,

है तलाश पुरकैफ़ सहर की.

 

ग़ज़ल बन गया उसका चेहरा,

आज मिली है दाद हुनर की.

 

“साबिर” उनका नूर जो देखा,

आँख झुक गई शम्सो-क़मर की.

---

- डॉ. नमन दत्त "साबिर"

वरिष्ठ व्याख्याता,

इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, 

    "घरौंदा" , 61- क

    सिविल लाइन्स,

    खैरागढ़ (छत्तीसगढ़)

    ई मेल - dr.dutt99.khairagarh@gmail.com

dr.dutt99_khairagarh@rediffmail.com

dr.dutt99_khairagarh@yahoo.in

1 blogger-facebook:

  1. रात कह रही चीख चीख के,
    है तलाश पुरकैफ़ सहर की ।

    बेहतरीन गज़ल, बधाई व आभार।

    उत्तर देंहटाएं

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