शुक्रवार, 4 मार्च 2011

मंजरी शुक्ल की कविता - मैं तेरा गुनहगार हूँ माँ

मैं तेरा गुनहगार हूँ  माँ
 मैं तुझे भूल गया
उन झूठे रिश्तों के लिए
जो मैंने बाहर निभाए
उन झूठे नातों के लिए
जो मेरे काम  ना आये
मैं तेरा गुनहगार हूँ  माँ
 
बॉस के कुत्ते को कई बार
डॉक्टर को दिखाना पड़ा
पुचकार कर उसे खुद
अपना हाथ भी कटवाना पड़ा
पर तेरा चश्मा न बनवा पाया
तुझे दवा भी ना दिलवा पाया
मैं  शर्मिंदा हूँ माँ उन
सभी आंसू के लिए
जो मैंने तेरी आँखों  से बहवाए
मैं तेरा गुनहगार हूँ  माँ
 
वो सर्दी में पुराने ट्रंक  से
तेरे दो स्वेटर निकाल देना
और घर की पुरानी चादरों से तुझे उढ़ा देना
फटी चप्पलों  से तेरा पूरा साल  निकलवा देना
और नई माँगने पर तुझे सौ बातें सुना देना
मैं तेरा गुनहगार हूँ  माँ
 
उसके बाद झूठी  शान के लिए
मेक्ड़ोनाल्स   में बर्गर खाना
बच्चों को पिज्जा हट घुमाना
करवा चौथ  पर बीवी
को डिजाइनर साड़ी
दिलवाना
 मैं तेरे नौ महीने का कष्ट
भूल गया और उसका एक
दिन का उपवास याद रहा
मैं तेरा गुनहगार हूँ  माँ
 
हरी साड़ी के साथ तेरा   नीला  ब्लाउज
मुझे कभी अजीब नहीं लगा
तेरे बालो की पकती सफेदी भी मुझे नहीं देखि
जब मैंने और मेरी बीवी ने
अपने बाल डाई किये
और होटल को चल दिए
तो तूने फीकी मुस्कान से मुझे देखा
मुझे थिएटर  में हीरो के मरे बाप को
 देखकर पिताजी की बरसी याद आई
मुझे माफ़ कर देना माँ
मैं तेरा गुनहगार हूँ माँ

---

डॉ. मंजरी शुक्ल
श्री समीर शुक्ल
सेल्स ऑफिसर (एल.पी.जी.)
इंडियन ऑइल कॉरपोरेशन
गोरखपुर ट्रेडिंग कंपनी
गोलघर
गोरखपुर (उ.प्र.)
पिन - २७३००१

5 blogger-facebook:

  1. बहुत सुंदर...
    आज की हकीकत बयां करती रचना...
    वाकई वो सभी गुनहगार हैं मां के...जिसने भी उसको नहीं समझा...उसकी ममता को नहीं जाना...मां को नहीं जाना

    उत्तर देंहटाएं
  2. उफ़्………भयावह सच उजागर कर दिया।

    उत्तर देंहटाएं
  3. सत्य वचन मंजरी जी ! आलम तो यही है ...इससे निजात कैसे पायी जाय ?

    उत्तर देंहटाएं
  4. amita5:41 am

    सच को बहुत सुन्दरता से लिखा है बहुत अच्छी कविता है
    अमिता

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुंदंर
    अपने बच्चों को संस्कार न दे पाने के कारण ऐसा हो रहा है
    समाज एवं शिक्षा प्रणाली को समाधान खोजना होगा
    डॉ रावत
    dr.rajeev.rawat@gmail.com

    उत्तर देंहटाएं

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