सोमवार, 7 मार्च 2011

रामदीन की कविता - कभी आपने सोचा है

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कभी आपने सोचा है

बाउजदी था एक बेचारा ट्‌यूनीशिया' में रहता था

बेच के सब्‍जी किसी तरह से गुजर बसर वह करता था

नगर पालिका अधिकारी ने एक दिन उसको पकड़ लिया

मांगे पैसे, ना देने पर उसे जमीन पे पटक दिया

हड्‌डी तोड़ी रहेड़ी फोड़ी, जीने का हक छीन लिया

किसी तरह से गिरते पड़ते राज्‍यपाल के पास गया

कारिंदे ने मार भगाया मिलने से इन्‍कार किया

संसारी सब विपदाओं ने उसको आय दबोचा है

क्‍या बीती उस बेचारे पर, कभी आपने सोचा है

चार जनवरी सन ग्‍यारह को उसने खुद को आग लगाली

दो से चार, चार से चौदह लाखों की फिर भीड़ जुटाली

आह गरीब की जो रंग लाई भस्‍म फिर तंत्र हुआ

भागा तानाशाह वहां से जनता का फिर राज हुआ

बाउजदी क्‍या वही का वासी, कभी आपने सोचा है

जागे नहीं अभी भी, तो फिर बहुत बड़ा यह धोखा है

ऐसी चल गयी हवा जोर से लपट में झुलसे मिस्र मुबारक

भइया मुझको डर लगता है, उनको उनका तंत्र मुबारक

सभी जगह है बाउ अजीजी अमेरिका हो या बहरीना

अब तो चेता महानुभावों पता नहीं था फिर मत कहना

चीनी तक पहुँची चिंगारी हवा चल रही बड़े वेग से

धधक उठा है मुल्‍क पड़ोसी चेतो भइया बड़े वेग से

सभी जगह है बाउ अजीजी कभी आपने सोच है

खून निचोड़ें काटें बोटी जग ने उनको नोचा है

खुरपी, तसला, झाड़ू, बरतन उनका यही खजाना है

बराबरी की बात करें तो गुस्‍ताखी ना कहना है

होश में अब भी तुम आ जाओ गले लगालो आगे बढ़कर

मुँह में राम बगल में छुरी, छोड़ो, भइया चाहे कुढ़कर

हवा का रुख अब भी पहचानो मिस्र तो एक बहाना है

धोती को रुमाल बताते बीता बहुत जमाना है

वह पहले रुमाल सी धोती, कभी आपने सोचा है

सभी जगह है बाउ-अजीजी कभी आपने सोचा है

खाओ मलाई आप अकेले उनको टुकड़े अब मत फेंको

छद्मवेश में बने भेड़िये श्रीमान मत रोटी सेंको

मन के भीतर क्‍यों गरियाते, कभी आपने सोचा है

सभी गह है बाउ अजीजी कभी आपने सोचा है

--

-रामदीन

जे-431, इन्‍द्रलोक कालोनी

कृष्‍णानगर, कानपुर रोड, लखनऊ

' ट्‌यूनीशिया-अरब परिवर्तन क्रान्‍ति का जनक देश

3 blogger-facebook:

  1. कभी आपने सोचा है..... बाउजदी था एक बेचारा ट्‌यूनीशिया' में रहता था बेच के सब्‍जी किसी तरह से गुजर बसर वह करता था नगर पालिका अधिकारी ने एक दिन उसको पकड़ लिया मांगे...

    सार्थक रचना....बधाई...

    उत्तर देंहटाएं
  2. बेनामी12:44 pm

    Ramdeen ki kavit kabhi ap ne socha hai hamey ane wale tuphan se saudhan karti hai. etni achchi kavita ke leye koti koti badhai
    Pankaj Sharma

    उत्तर देंहटाएं
  3. ईमेल से प्राप्त अनिल चन्द की प्रतिक्रिया:
    अरब उबल रहा है, चीन तिलमिला रहा है, भारत में दस्‍तक हो चुकी है। फिर भी क्‍यों हम शुतुरमुर्ग की तरह बैठे है। यह सवाल रामदीन की कविता कभी आपने सोचा है ने सोचने के लिये कुछ सवाल के साथ मन के किसी कोने में जीवित सच को बाहर लाने के लिए एक दस्‍तक दी है। पहले भी कई कविताऐं रचना कार पर रामदीन जी की पड़ चुका हूॅ लेकिन इस कविता ने अन्‍दर तक झकझोर दिया और प्रतिक्रिया स्‍वरूप कुछ शब्‍द लिखने के लिये विवश कर दिया। क्‍या वास्‍तव में आने वाला समय कविता में आ गया है।

    अनिल चन्‍द
    64-बी, दारूलसफा
    लखनऊ

    उत्तर देंहटाएं

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