मंगलवार, 22 मार्च 2011

महादेवी वर्मा की कविता - '?'

          ?

शून्यता में निद्रा की बन,

उमड़ आते ज्यों स्वप्निल घन,

पूर्णता कलिका की सुकुमार,

छलक मधु में होती साकार;

 

हुआ त्यों सूनेपन का भान,

प्रथम किसके उर में अम्लान ?

और किस शिल्पी ने अंजान,

विश्व प्रतिमा कर दी निर्माण?

 

काल सीमा के संगम पर,

मोम सी पोड़ा उज्ज्वल कर,

उसे पहनायी अवगुण्ठन,

हास औ रोदन से बुन बुन !

 

कनक से दिन मोती सी रात,

सुनहली साँझ गुलाबी प्रात;

मिटाता रँगता बारम्बार,

कौन जग का यह चित्राधार ?

 

शून्य नभ में तम का चुम्बन,

जला देता असंख्य उडुगण;

बुमा क्यो उनको जाती मूक,

भोर ही उजियाले की फूँक ?

 

रजतप्याले में निद्रा ढाल,

बाँट देती जो रजनी बाल,

उसे कलियों में आँसू घोल,

चुकाना पड़ता किसको मोल ?

 

पोंछती जब हौले से वात,

इधर निशि के आँसू अवदात,

उधर क्यों हँसता दिन का बाल,

अरुणिमा से रंजित कर गाल ?

 

कली पर अलि का पहला गान

थिरकता जब वन मृदु मुस्कान,

विफल सपनों के हार पिघल

ढुलकते क्यों रहते प्रतिपल ?

 

गुलालों से रवि का पथ लीप

जला पश्चिम में पहला दीप,

विहँसती संध्या भरी सुहाग

दृगों से झरता स्वर्ण-पराग;

 

उसे तम की बढ़ एक झकोर

उड़ा कर ले जाती किस ओर ?

अथक सुषमा का स्रजन विनाश

यही क्या जग का श्वासोच्छ्वास ?

 

किसी की व्यथा सिक्त चितवन

जगाती कण कण में स्पन्दन,

गूँथ उनकी साँसों के गीत,

कौन रचता विराट संगीत ?

 

प्रलय बनकर किसका अनुताप,

डुबा जाता उसको चुपचाप ?

 

आदि में छिप आता अवसान

अन्त में बनता नव्य विधान,

सूत्र ही है क्या यह संसार

गुंथे जिसमें सुख-दुःख-जय-हार?

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1 blogger-facebook:

  1. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (24-3-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

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