गुरुवार, 24 मार्च 2011

विजय वर्मा की ग़ज़ल - बातों बातों में छलने का मौसम है...

   

ये मौसम 
बातों-बातों में छलने का मौसम है,

सर्द-आहों से पिघलने का मौसम है.

 

झूठ है,फरेब है ,दगा है ,बेईमानी है.

आप अब तक बचे है,ये क्या कम है!

 

नज़रों से  दूर तो नज़रअंदाज़ कर दिए,

सामने है तो बस हम ही हम है.

 

वक़्त का क्या है, गुजरता जाता है,

सुना है ज़माने में और भी ग़म है.

 

वह दौर भी गुजरा है कि हाथों में फूल थे,

आज तो नौनिहालों के भी हाथों में बम है.

 

हम तो हर बार सच बोल के हारे है ,

अपनी तो ऐसी है 'मेरे नादाँ सनम है.

 

आज भी है तेरी ईजाओं का इंतज़ार ,

बचा के रखना तेरे जितने सितम है 

 

उलाहने दो, ताने दो पर कुछ तो बोलो ,

देखो चुप ना रहना तुम्हे मेरी कसम है..

 


--
v k verma,sr.chemist,D.V.C.,BTPS

BOKARO THERMAL,BOKARO
vijayvermavijay560@gmail.com

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