शनिवार, 5 मार्च 2011

यशवन्‍त कोठारी का व्यंग्य : बजट - चन्द रातें संशय की

फरवरी-मार्च के महीने में पहले फाग गाये जाते थे। समय बदला और अब बजट की गीतिकाएं गाई जाती हैं।

बजट के इन दिनों में मेरी रातें बड़ी संशय में गुजरती हैं। वित्त्‍ा-मंत्री ने अपने टैक्‍सों का जूता कुछ इस अन्‍दाज में दिखाया कि मुझे दिन में तारे और रात में बजट की प्रतिक्रियाएं दिखाई देने लगी। जैसे-तैसे कर के मैं इस बजट को झेल गया, क्‍योंकि अभी राज्‍य सरकार भी अपने बजट रूपी जबड़ों में मेरे जैसे आम व्‍यंग्‍यकारों को फंसाने की कोशिश में थी। महंगाई-भत्ते की अतिरिक्‍त किश्‍तों के बारे में निर्णय इसलिए नहीं लिये जा सके, कि कर्मचारी-नेता सरकार की बात नहीं मानते। सरकार भी क्‍या करे, वो विश्‍व-बैंक की सुने या अपने नौंकरों की! आप ही फैसला कीजिए, अरबों रुपयों का ऋण प्राप्‍त करना कोई हंसी-खेल है ? मुझे बनिया सौ रुपया उधार नहीं देता, यदि सरकार ने इतना बड़ा ऋण प्राप्‍त कर लिया तो यह उसकी साख है। और वरिष्‍ठ कवि कह गया है कि हर शाख पे उल्‍लू बैठा है․․․तो भाईजान, ऋण देने वाले की शर्तों का महत्‍व तो हमेशा ही रहता है!

आइए, बजट से पूर्व की रातों के संशय को अंधेरे में टटोलें। मैं और झपकलाल बाहर निकले। आकाश साफ नहीं था, क्‍योंकि बजट आने वाला था। हवा में हर वस्‍तु के दाम बढ़ने की संभावना लटक रही थी। कुछ दिव्‍य विभूतियां लम्‍बी कारों में सौदे तय कर रही थीं। मैंने एक सज्‍जन से पूछा-‘‘आप क्‍यों भाग रहे हैं ?'' पर उन्‍होंने पहले मुझे सिर से पैर तक देखा। फिर मेरे अज्ञान पर तरस खाते हुए कहने लगे-‘‘तुम्‍हें नहीं पता बजट आने वाला है ? कुछ बीडि़यां ही खरीद लें। बाद में महंगी हो जाएंगी!''

‘‘लेकिन तुम बीडि़यों का करोगे क्‍या ?''

‘‘क्‍या करूंगा ? अरे, कुछ नहीं तो ब्‍लैक ही करूंगा!''

वह व्‍यक्‍ति बिना कुछ और बताए, तेजी से आगे बढ़ गया।

हम कुछ और आगे बढ़े। एक आलीशान कोठी के बाहर भीड़ खड़ी थी। कुछ लोग तेजी से आ-जा रहे थे। पूछने पर बताया-‘‘कोठी के मालिक सेठ रामलाल को हार्ट-अटैक हो गया है। डॉक्‍टर जांच कर रहे हैं।''

‘‘सेठजी बच जाएंगे या नहीं ?''

‘कुछ कहा नहीं जा सकता! अगर बजट में टैक्‍स बहुत ज्‍यादा बढ़ जाए, तो हो सकता है, सेठजी बचें नहीं!'' मैंने भगवान से प्रार्थना करने के बजाए बजट पेश करने वाले से प्रार्थना की, कि जरा हमारे सेठजी के स्‍वास्‍थ्‍य का ख्‍याल रखना!

इतने में सेठ का इकलौता लड़का बाहर आया और डॉक्‍टर को डांटने लगा-‘‘तुमने सब स्‍टॉफ वालों को भेज दिया, अब इनकी देख-रेख कौन करेगा! मुझे क्‍लब जाना है। तुम जानो और सेठजी जानें!'' लड़का चला गया। डॉक्‍टर रात भर, बजट में टैक्‍स न बढ़ने की दुआएं करता रहा।

हम लोग और आगे बढ़ें। शहर में एक अजीब सन्‍नाटा व्‍याप्‍त था। कस्‍बे में आर्थिक, सामाजिक, नैतिक, राजनैतिक घुटन के ऊपर बजट की घुटन थी। रात होने के बावजूद एक जगह मिट्टी का तेल, बजट के बाद वाले दामों में बिक रहा था। झपकलाल तेल और तेल की धार देखकर मचल गया। मैंने बेचने वालों से पूछा-

‘‘बजट का ऊंट किस करवट बैठ रहा है ?''

उसने तेल से सने कपड़े को हिलाते हुए कहा-‘‘कई फरक नी पड़े भाया! तेल तो तेल है!''

बजट की रात हो, संशय की दीवारें हों तो मन कवि की तरह उड़ानें भरता है। हम फिर चल पड़े। बम्‍बई रात की बाहों में, और कस्‍बे बजट की बाहों में।

हम वापस घर को आए। बजट आ चुका था। टैक्‍स लगने थे, सो लग गये थे। और भारतीय आम आदमी बेचारा, टैक्‍स की मार से बचने के लिए अपनी खोली में घुस गया था।

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यशवन्‍त कोठारी

86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुर-302002 फोनः-2670596

ykkothari3@gmail.com

3 blogger-facebook:

  1. Oont to karvat badalta rahta hai! Aadat-si pad gayee hai! Aalekh bahut achha likha gaya hai!

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  2. अब घबराये का होत...जब मुखर्जी बाबू लगा दिये टैक्स...

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  3. ब्यंगात्मक लेख बहुत अच्छा लगा| धन्यवाद|

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