बुधवार, 23 मार्च 2011

शेर सिंह की लघुकथा - पुण्‍य लाभ

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तीर्थ स्‍थली पुरी में भगवान जगन्‍नाथ के उस बहुत बड़े मंदिर में जा कर, उस ने जहां कहीं भी मूर्तियां, तस्‍वीरें और फल- फूल चढ़ाए हुए स्‍थान देखे, वह श्रद्धा और आदर से उन के सामने नतमस्‍तक हो कर अपना शीश झुकाता रहा । दरअसल, वह अपने एक प्रिय जन की अकाल मृत्‍यु के पश्‍चात मंदिर में दिवंगत आत्‍मा की शान्ति और अपने मन को संतोष और पुण्‍य कमाने के इरादे से आया था ।

बहुत देर तक भगवान की मूर्तियों पर श्रद्धा सुमन अर्पित करने के पश्‍चात एवं मंदिर की प्रदक्षिणा कर वाहर निकला तो मंदिर के पास बैठे - खड़े कुछ भिखारियों को अपने प्रिय बन्‍धु को याद करते हुए पच्‍चीस- पचास पैसे के सिक्‍के फैंकते आगे बढ़ता रहा । जेब में पड़ी थोड़ी सी रेजगारी जब खत्‍म हो गई, तो उस ने भिखारियों को आगे ब़ने से रोक दिया । लेकिन एक भिखारी जिसे शायद कुछ नहीं मिला था, उस के पीछे ही पड़ गया । "मोते भी दियो बाबू …मोते भी दियो बाबू " की रट लगा कर । भिखमंगा जब उस के साथ ही हाथ फैलाए चलने लगा तो वह असहज होने लगा । और फिर उस को गुस्‍सा ही आ गया । उस ने एक नजर इधर- उधर डाली और एक झन्‍नाटेदार चांटा भिखमंगे के गाल पर जड़ दिया । भिखमंगा अविश्‍वास से वही खड़ा रह गया । पलभर में ही भिखमंगे की आंखें घृणा से भर गई थी । लेकिन वह संतोष से आगे बढ़ गया जैसे कुछ हुआ ही न हो ।

 

O शेर सिंह

अनिकेत अपार्टमेंट, प्‍लाट नं. 22

गिट्टीखदान लेआउट, प्रतापनगर

नागपुर - 440 022

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