सोमवार, 21 मार्च 2011

श्रीकांत वर्मा की कविता - फागुन

tesu palash ke fhool टेसू पलाश के फूल

 

फागुन भी नटुआ है, गायक है, मंदरी है।

अह। इसकी वंशी सुन

सुधियां बौराती हैं।

 

अपनी दुबली अंगुली से जब यह जादूगर

कहीं तमतमायी

दुपहर को छू देता है,

महुए के फूल कहीं चुपके चू जाते हैं

और किसी झुंझकुर से चिड़िया उड़ जाती है।

अह। इसकी वंशी सुन....।।

 

जब फगुनी हवा कहीं

मोरों के गुच्छ हिला

ताल तलैया नखा तीर पर टहलती है

ऋतु की सुधियां शायद

टेसू बनकर, वन वन

शाख पर सुलगती हैं।

 

दिन जब टूटे पीले पत्ते सा कांप कहीं

ओझल हो जाता है

संझा जब उमसायी, किसी

ताल-तीर बांस झुरमुट से झांक मुंह दिखाती है,

सरसों के खेतों में पीली

जब एक किरन

गिर गुम हो जाती है,

मेड़ों पर जब जल्दी-जल्दी

कोई छाया

आकुल दिख पड़ती है,

दूर किसी जंगल से मंदरी यह आता है

धिंग धिंग धा धा धिंग धा

धा धिंग धा धा धिंग धा

मांदल धमकाता है,

हौले हौले घर-आंगन में छा जाता है।

इस सूने जीवन में बांसुरी बजाता है।

अह! आह इसकी वंशी सुन...।

---

कविता संग्रह - भटका मेघ, प्रकाशक राजपाल एंड सन्ज़, कश्मीरी गेट दिल्ली से साभार.

1 blogger-facebook:

  1. सुन्दर अभिव्यक्ति के लिए श्रीकांत वर्मा जी बधाई के पात्र हैं !
    आभार !

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