शनिवार, 5 मार्च 2011

दामोदर लाल जांगिड़ की ग़ज़ल

DSCN4404 (Custom)

इक सचेतक सजग गुप्‍तचर लेखनी।

और बजी सर्वदा बन गज़र लेखनी॥

 

जब ये विरही के मन की तहों में गयी,

तब गयी दौड़ पी के नगर लेखनी।

 

जब भी बस्‍ती में निर्बल कराहें सुनी ,

तो सुना रोयी हैं रात भर लेखनी।

 

हासिये तू भी सुर्खी तब आ सका,

जब चली तुझपे कस के कमर लेखनी।

 

जो तवारीख लिखी थी तलवार ने,

मिट गयी होती होती न गर लेखनी।

 

जुर्म सहकर बगावत क्‍यों खामोश हैं,

इससे वाकिफ हैं ये जादूगर लेखनी।

 

जो भी ढ़र्रे से हट के चली हैं कभी,

वो हुई हैं अमर 'दामोदर' लेखनी।

--

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------