दामोदर लाल जांगिड़ की ग़ज़ल

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इक सचेतक सजग गुप्‍तचर लेखनी।

और बजी सर्वदा बन गज़र लेखनी॥

 

जब ये विरही के मन की तहों में गयी,

तब गयी दौड़ पी के नगर लेखनी।

 

जब भी बस्‍ती में निर्बल कराहें सुनी ,

तो सुना रोयी हैं रात भर लेखनी।

 

हासिये तू भी सुर्खी तब आ सका,

जब चली तुझपे कस के कमर लेखनी।

 

जो तवारीख लिखी थी तलवार ने,

मिट गयी होती होती न गर लेखनी।

 

जुर्म सहकर बगावत क्‍यों खामोश हैं,

इससे वाकिफ हैं ये जादूगर लेखनी।

 

जो भी ढ़र्रे से हट के चली हैं कभी,

वो हुई हैं अमर 'दामोदर' लेखनी।

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