अनंत केदार की कविता - बचपन में

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बचपन में

मुझे अक्सर बचपन में सपने आते थे

कभी रोटी के तो कभी सिक्कों के

'ताजी रोटी और चमकदार सिक्के'.

सुबह जब मैं अपनी माँ से कहता

तब वह कहती "बेटा सपने में सिक्के आना ठीक नहीं

हरे हरे नोट आने चाहिए कागज के

वे शुभ होते हैं "

 

शुभाशुभ पता नहीं

लेकिन आज मैं अपनी माँ की सायकोलोजी को जान गया हूँ.

क्योंकि सपने आमदनी और आकांक्षाओं

के सूचक होते हैं

' सपने देखने हैं तो

नोटों के देख, सिक्कों में क्या रखा है'

मेरे सपनों को वे  हमेशा बढ़ावा देना चाहती थी.

कौन कहता है अशिक्षित महिलाएँ

अपने बच्चों का भविष्य नहीं बनातीं…?

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Anant Kedare

Head,

Department of Hindi

Arts, Science and Commerce College, Kolhar,

(Affiliated to University of Pune)

Tal. Rahata, Dist. Ahmednagar 413 710

Maharashtra (India)

Mob. 09921772483

E mail : ankedare@gmail.com

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5 टिप्पणियाँ "अनंत केदार की कविता - बचपन में"

  1. sachin wagh10:14 am

    Anand Dada Good Poem. Bachpan ke din yad aaye.....

    उत्तर देंहटाएं
  2. Nice poem and this is very meaningful.
    From-Geeta Dhaneshwar & Shweta Bhavsar

    उत्तर देंहटाएं
  3. बेनामी9:37 pm

    HI
    ANANT
    YOUR POEM IS REALISTIC
    KEEP IT UP
    B.V.AVHAD

    उत्तर देंहटाएं

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