शुक्रवार, 25 मार्च 2011

पुरुषोत्तम विश्वकर्मा लिखित नया भारतीय अराष्ट्रगान

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यहां डाल डाल पर रिश्‍वत और दलाली करे बसेरा।

अहा! कैसा मुल्‍क है मेरा ॥

 

रहे विपक्ष में तब तक है सब सीधे और सयाने।

हाथ लगी कुर्सी जिसके भी लगता माल कमाने॥

 

यहां हर फाईल में ही मिलता हैं घोटालों का फेरा।

अहा! कैसा मुल्‍क है मेरा ॥

 

किसने किसने कितना खाया सबको जोड़ा जाय।

कर्जा सारा ही भारत का उतने में चुक जाय ॥

 

जिसको परखा वो ही निकला हड़फू चोर लुटेरा ।

अहा! कैसा मुल्‍क है मेरा ॥

 

किसको देश की सेवा करनी केवल बातें करते।

पांच साल में ठूंस ठूंस कर जेबें अपनी भरते॥

 

मैने तो अपनी कह दी हैं अब सब काम हैं तेरा।

अहा! कैसा मुल्‍क है मेरा ॥

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पुरुषोत्‍तम विश्‍वकर्मा

8 blogger-facebook:

  1. अच्छी पैरोडी है, लेकिन शीर्षक थोड़ा सा अलग है..

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  2. सधा हुआ व्यंग किया है आपने इस रचना में. मेरी बधाई स्वीकारें .

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  3. मैने तो अपनी कह दी हैं अब सब काम हैं तेरा।----यहे तो आप भी कर रहे हैं...

    उत्तर देंहटाएं
  4. १०० में १०१ बेईमान फिर भी मेरा भारत महान

    उत्तर देंहटाएं
  5. तुकबंदी ठीक है नहीं अच्छा है , पर शीर्षक ठीक नहीं है.

    उत्तर देंहटाएं
  6. purushottam ji, ek kaam kariye ki apni is kavita ka shirshak badal kigiye. kyonki rashtragan ke naam par log ise padhte hai. aur matter kuchch aur hi hai. comment achcha hai, par rashtragan ka apmaan bhi aap kar rahe hai. so please change the title.

    उत्तर देंहटाएं
  7. लेखक का ईमेल से प्राप्त प्रत्युत्तर -
    Bhratrvat sadar vande
    Naya rastriy gan nam se prakashit rachana ek parodi hai jo maine
    HOLI par 13/03/2011 ko bheji thi jisaka koi shirshak tha hi
    nahin.,jaisa ki hasya men hota hai ye shirshak viheen thi ,aapaka
    etraj vajib hai ,maine sampadak ji ko soochi kar diya hai,
    Marg darshan ke liye dhanyvad
    Aapaka bhi
    Purushottam Vishavkarma
    --
    चूंकि इसके शीर्षक से लोगों की भावनाओं को कष्ट पहुँचा है, और ऐसा कोई इरादा न तो लेखक का न संपादक का रहा है, इसे महज व्यंग्य में लिया जाना चाहिए, फिर भी हम माफ़ी मांगते हैं और शीर्षक को परिवर्तित कर रहे हैं.

    उत्तर देंहटाएं

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