गुरुवार, 17 मार्च 2011

मालिनी गौतम की कविता - याद

याद

याद !

चली आती है,

बिन बुलाए मेहमान की तरह !

बंद दरवाजे और खिड़कियाँ

दरीचों से झाँकती

सूरज की रोशनियाँ

अंधेरे काले नाग को

निगल जाती है,

याद !

 

चली आती है ।

आंगन में फैली तन्हाईयाँ

धूप में लिपटी

कितनी परछाईयाँ

दबे पांव

पसर जाती है,

याद !

 

चली आती है ।

उज़ड़ी हुई वीरानियाँ

जिस्मों से निकली

मादक अंगड़ाईयाँ

चुपचाप धीरे से

बहका जाती है,

याद !

 

चली आती है ।

खामोश सहमी वादियाँ

बीते दिनों की

कितनी कहानियाँ

अंधेरी रातों में

कहर ढ़ा जाती है,

याद !

 

चली आती है,

बिन बुलाए मेहमान की तरह ।

डॉ.मालिनी गौतम

8 blogger-facebook:

  1. यादें बड़ी बेरहम होती हैं ..सच्ची ..!

    उत्तर देंहटाएं
  2. यादों पर किसी का कोई वश कहाँ ...
    अच्छी रचना

    उत्तर देंहटाएं
  3. यादें ऐसी ही होती हैं ...सुन्दर प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  4. याद !
    चली आती है,
    बिन बुलाए मेहमान की तरह ।
    बहुत सुन्दर कविता लगी आपकी. मन को छूती इस रचना हेतु मालिनी जी आपको हार्दिक बधाई. साथ ही होली की शुभकामनाएं भी.
    --

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर कविता| धन्यवाद|

    उत्तर देंहटाएं
  6. यादों को बिम्ब बनाकर एक बेहतरीन अभिव्यक्ति , बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  7. om shanti! kavita-YAD-behad khoobsoorat aur dilkash ahsas hai. man bhar aaya. laxmi Kant.

    उत्तर देंहटाएं
  8. चली आती है
    खामोश सहमी वादियाँ
    बीते दिनों की
    कितनी कहानियाँ
    अंधेरी रातों में
    कहर ढ़ा जाती है,
    याद !

    भावनाओं का बहुत सुंदर चित्रण . ...बधाई

    उत्तर देंहटाएं

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