शुक्रवार, 4 मार्च 2011

एस. के. पाण्डेय का व्यंग्य - ससुराल का स्वागत

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राजू को जब ससुराल जाना हुआ तो उसने कई दिन पहले ही तैयारी शुरू कर दिया। बहुत ही उत्साहित था। लोगों से जब देखो तब ससुराल के बारे में ही बात करता। तरह तरह के प्रश्न पूछता। जैसे क्या कोई बता सकता है कि ससुराल के सारे रिश्ते ‘स’ से ही क्यों शुरू होते हैं ? साली को आधी घरवाली कहते हैं, तो घरवाली यानी पत्नी को अर्धांगिनी क्यों कहते हैं ? इत्यादि। खैर ससुराल में उत्सव था। उसी में भाग लेने के लिए राजू को जाना था। और राजू जी पहुँच भी गए।

हर कोई चाहता है कि वह जहाँ जाए वहाँ उसका स्वागत हो। जो किसी का स्वागत नहीं करते वो भी स्वागत की अपेक्षा रखते हैं। ससुराल तो ऐसी जगह होती है जहाँ से सबको बहुत अपेक्षा होती है। मान-सम्मान, धन, दुल्हन सब ससुराल से चाहिये। खैर उत्सव था ही, इसलिए तमाम लोग जमा थे। राजू पहुँचे तो चाय-पानी मिला पीने के लिए और कुर्सी बैठने के लिए। कुछ देर बाद किसी ने कहा कि चलिए घर में, वहाँ भी सबसे मिल लो। राजू घर में गए। कई महिलाएं बैठी थीं, प्रणाम किये। उन्हीं में उनकी छोटी सलहज भी बैठी हुई थी। उसे भी प्रणाम करने चले तो किसी ने कहा कि ये तो आपकी सलहज हैं। सलहज निर्विकार बैठी रही। राजू ने सोचा यहाँ का यही रिवाज होगा। सालियाँ नमस्ते करके गायब हो गईं। उत्सव में बहुत से लोग आये थे। सालियों को तो सबको देखना था। पहले सालियाँ कहती थीं कि जीजाजी, इनके आगे जी और इनके पीछे जी। इसलिए आगे-पीछे लगी रहती थीं। अब कहती हैं जीजा यानी जा जी। अतः धीरे-धीरे इनके पास कोई न बचा। तब यह सोचकर कि अकेले कब तक बैठा रहूँ, बाहर आकर उसी कुर्सी पर बैठ गए गए। सभी लोग उत्सव में लगे रहे।

रात के नव, दस और ग्यारह भी बज गए। राजू कुर्सी पर ही विराजमान रहे। क्योंकि कुर्सी भी छिन जाने का संकट था। हर जगह कुर्सी छिनने का संकट मंडराता ही रहता है तो राजू के कुर्सी पर भी ऐसा होना आश्चर्य नहीं है। कुर्सी पाने वाले कुर्सी से चिपक जाते हैं, छोड़ना आसान नहीं रहता। चाह कर भी नहीं छोड़ पाते। यही हाल राजू का भी था। कुर्सी छोड़ कर जाएँ कहाँ ?

एक आदमी को राजू पर थोड़ी दया आ गई तो वह भी इनके पास आकर बैठ गया। बोला देख रहे हो यहाँ कोई बात पूछने वाला नहीं है। यह ससुराल थोड़ा दूसरे किस्म की है। यहाँ दामाद पहली बार यानी जब शादी में आता है तभी दामाद समझा जाता है। सास-ससुर के राज में ऐसा है तो सालों के राज में क्या होगा आप खुद ही अनुमान लगा सकते हैं। फिर भी खाना-वाना खाये कि नहीं। राजू बोला कि अब तक नहीं खाये तो अब क्या खायेंगे ? पहली बार आपने ही पूछा है। बारह बजने को है। अब कहीं लेटने का इंतजाम हो जाता तो वही बहुत था। अन्यथा तबीयत खराब हो जायेगी।

वह आदमी बोला इंतजाम खुद ही करना होगा। हम तो जमीन पर भी सो सकते हैं। खैर चलो आप के लिए कुछ करते हैं। एक कमरे में कुछ लोग बेड पर लेटे हुए थे। उन्हीं से विनती करके रामू ने बेड पर अपने लिए जगह बनाई। इतने में उनमें से एक आदमी जो बाहर गया था, आया और बोला कि कितने लोगों को इसी में घुसेड़ लोगे। रामू बोला रात भर की ही बात है भाई। वैसे मैं ज्यादा जगह नहीं लूँगा। और रजाई की भी आवश्यकता नहीं है। आप लोग ओढ़े रहिये। रजाई नहीं मिली तो चद्दर से ही काम चलाना लाजिमी था। खैर कुछ तो सकून मिला। लेकिन ठंड के कारण नींद नहीं लगी। बगल वाले ने रात भार में दसों बार रामू को लाँघ-लाँघ कर अपना आवागमन जारी रखा। राजू एक बार लाँघ जाने पर अपने छोटे भाई को एक चांटा मारा था। वह घटना उसे याद आ गई। आज ससुराल में दसों बार उसे किसी ने लाँघा पर वह कुछ बोल भी न सका।

सुबह दोस्त का फोन आया। दोस्त बोला क्यों भाई आज तुम्हारा क्या कहना ? ठाट होंगे । राजू बोला आया तो था ठाट से ही। दोस्त बोला अच्छा ये तो बता किसी प्रश्न का जवाब मिला। राजू बोला अब तक तो नहीं लेकिन कई नए प्रश्न खड़े हो गए हैं। दोस्त बोला ठीक है। वापस तो आ जाओ फिर बताते हैं। रामू सोचने लगा रात में तो बच गया। लगता था देह ऐंठ जायेगी। बच गया तो वापस तो आऊँगा ही।

सुबह के चार-पाँच बजे तक जश्न चला। सुबह होने पर राजू चलने लगा तो लोगों ने कहा कि सुना है तबियत खराब हो जाने के डर से आपने खाना भी नहीं खाया था। अभी कल ही तो आये हो आज खाना खाओ। आराम करो कल जाना। बहुत खाना बचा है। राजू सोचने लगा कि आज ही चला जाऊँगा तो दोस्तों को क्या जवाब दूँगा ? सभी लोग कहेंगे कि तैयारी किया हफ्तों और रुके नहीं एक भी दिन। लेकिन किसी भी तरह वह रुक नहीं पाया। जो खाना रात में नहीं खाया था, वही दिन में खाया और चलता बना। चलते समय भी घर में गया। जैसे पहुँचा सलहज ने जेब में कुछ डाला और कहीं चली गई। राजू भी चल दिया। इतने ही के लिए घर में बुलाया गया था। वास्तव में मन भारी था। लेकिन लगता कि जेब बहुत भारी हो गई है और भारी जेब लिए वापस लौट आया। कौन समझाये कि हर कोई जेब भारी करना उतना पसंद नहीं करता जितना कि प्रेम से थोड़ी बहुत आवभगत।

राजू को देखकर किसी दोस्त ने कहा कि गए थे महकते और चहकते और आ रहे हो मुँह लटकाए। क्या हुआ भाई ? कुछ तो बताओ। राजू ने सिर दर्द बताकर टाल दिया। लेकिन शाम को जब सभी दोस्त इकट्ठा हुए। तो कोई कुछ कहता तो कोई कुछ। आख़िरकार न चाहते हुए भी राजू ने आपबीती सुना दिया। एक दोस्त चुटकी लेते हुए बोला कि दहेज में ही कभी आने पर लेटने और खाने के लिए भी माँगना था। राजू बोला मुझे दहेज कहाँ मिला था ? तुम्हें याद नहीं है क्या ?

कोई बोला अरे भाई, भाभी का तो तूने जिक्र ही नहीं किया। भाभी ने भी तुम्हारा कुछ ख्याल नहीं किया। राजू बोला मैंने कहा नहीं कि बहुत लोग आये थे। उन्हें भी दूसरों से फुर्सत नहीं थी। दोस्त बोला भाभी से बताया यह सब कि नहीं। राजू बोला बताने से कोई फायदा नहीं है। वे सुनेंगी ही नहीं। वे जितना मायके वालों का सुनती हैं। उतना न ही मेरा और न ही घर वालों का। ससुराल वाले चाहे जहर दे दें तो भी वे यही कहेंगी कि दिया तो अमृत ही था। तुम्हारे हाथ में आकर जहर बन गया होगा।

श्यामू कहता कि आजकल ससुराल के स्वागत के तौर तरीके काफी बदल चुके हैं। तुम्हारी ससुराल तो ठीक है। कई लोग हँसते जाते हैं और रोते आते हैं। कुछ लोग तो हाथ-पैर भी तोड़वा बैठते हैं। शादी में तो गाली मिलती ही है। बाद में और जबरदस्त। बात गाली तक सीमित रहे तो भी ठीक है। पर हाथ-पैर किसको प्रिये नहीं होते। रानू जब अपने ससुराल से आये तो माथा फूला हुआ था। पूछने पर बोले कि नल से नहाने के लिए पानी निकाल रहा था। अचानक हैंडल का नट निकल गया और हैंडल माथे से टकरा गई। कोई दूसरी बात नहीं है। जैसा तुम सोच रहे हो।

मोहन कहता कि ससुराल वालों का ही सारा दोष थोड़ा रहता है। हर चीज की सीमा होती है। ससुराल वाले शादी से ही परेशान रहते हैं। विज्ञान भी कहता कि प्रत्येक क्रिया के विपरीत प्रतिक्रिया होती है। यह मूलभूत सिद्धांत है। इसलिए पत्नी तो प्रतिक्रिया करती ही रहती है। और ससुराल वाले तंग आकर कुछ कर बैठते है। आजकल का सिद्धांत है कि पाँव पूजे हैं सिर नहीं। फिर भी कुछ लोग पाँव को भी नहीं बख्शते । जब बिना मतलब शेखी बघारते रहोगे। तो अंजाम भुगतना ही पड़ेगा। जमाना बदल चुका है। नए जमाने में नए तरीके से स्वागत लाजिमी है। मान लीजिए आप समय के बहुत पक्के हैं। रोज रात दस बजे ही खाना खाते हैं। तो कोई जरूरी नहीं है कि ससुराल जाएँ तो दस बजे का ही रट लगाये रहें। मुझे पता है कि इसी चक्कर में श्यामू का खाना कुत्ता खा गया था। हुआ यूँ कि आठ बजे खाना तैयार हो गया। छोटी साली बोली चलिए खाना खा लीजिए। ये बोले दस बजे खाना खाता हूँ। ठंडी का समय था। थोड़ी देर बाद साला आया कि जीजा खाना खा लीजिए। नहीं तो ठंडा हो जायेगा। ये फिर बोले कि मैं तो दस बजे खाता हूँ। लगभग साढ़े नव बजे सास बोली बेटा खाना लाऊँ। ये बोले अभी तो साढ़े नव बजे हैं। सबके बर्दाश्त की सीमा समाप्त हो रही थी। दस बजने में पाँच मिनट ही शेष था। ससुर जी बोले चलिए अब तो दस भी बज गए। ये बोले कि अभी दस कहाँ बजे हैं। लगता है कि आपकी घड़ी कुछ फास्ट है। मैं खाना अपनी घड़ी देखकर खाता हूँ। अभी दस मिनट बाकी है दस बजने में। ससुर जोर से चिल्लाये लाकर यहीं रख दो जब खाना होगा ये खा लेंगे। साली समझी कि जीजा ने ऐसा कहा होगा तो वह तुरंत लेकर आ गई। और खाना रखकर चली गई। सभी लोग खाने चले गए और इसी बीच इनका खाना कुत्ता खा गया।

राजू का एक अन्य दोस्त बोला कि शादी-विवाह और उत्सवों में कामकाज अधिक रहता है। इसलिए दिक्कत तो रहती ही है। लेकिन कौन आया है ? किसको बुलाया गया है। इसको ध्यान में रखकर कम से कम लेटने की व्यवस्था तो की जा सकती थी। चाहे जितनी व्यस्तता रही हो इतना तो कह ही सकते थे कि आपको वहाँ लेटना है। आप उस बिस्तर पर लेट जाएँ। आज के समय में ससुराल का स्वागत सुनकर मैं सोचता हूँ या तो शादी ही न करूँ अथवा वहाँ शादी करूँ जहाँ ससुराल ही न हो

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर(उ. प्र.)।

URL: https://sites.google.com/site/skpandeysriramkthavali/

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