सोमवार, 14 मार्च 2011

भूपेन्‍द्र सिंह गर्गवंशी का व्यंग्य आलेख - दाताओं के हुकुम का दलिद्दर

Dr.Bhupendr_Singh_Gargvanshi (Custom)

कहते हैं कि कहने पर धोबी गधे पर नहीं बैठता है। मेरा अपना मानना है कि धोबी गधे की सवारी करना ही नहीं जानता, या फिर उसे भय सताता है कि कहीं गधा बिदक गया तो दुलत्‍ती झाड़ देगा, ऐसे में उसकी इज्‍जत पर दाग लग जाएगा। कोई जरूरी नहीं कि मेरा मानना आप लोग मानें ही। धोबी और गधे की याद क्‍यों आई, जैसे-जैसे यह आलेख आप सब पढ़ेंगे तो वास्‍तविकता का ज्ञान हो जाएगा। हुआ यूँ कि मैने अपने शहर के कुछेक कथित नामी गिरामी पत्रकारों से मौखिक एवं एस0एम0एस0 के जरिए आग्रह किया कि वह लोग हमारे वेब पोर्टल के लिए अपने विचार, लेख एवं समस्‍याएँ भेजें उनका प्रकाशन किया जाएगा और साथ ही अपनी-अपनी नवीनतम फोटो भी दें। बस इसके बाद से उन भाइयों को जैसे साँप सूँघ गया हो। मिलना-जुलना तो दूर सेलफोन के जरिए हैल्‍लो तक कहना बन्‍द कर दिया। अब इसी पर मैंने मंथन शुरू कर दिया।

मंथन के दौरान मुझे धोबी और गधा याद आने लगे। मंथन करते हुए मैं कई निष्‍कर्ष पर निकला। पहला यह कि जिनसे मैंने लेखादि का आग्रह किया था वह लोग किसी न किसी बैनर के साथ जुड़े हैं शायद उन्‍हें भय सताए हो कि यदि पोर्टल पर उनके आलेख प्रकाशित हो गए तो ‘बैनर' से छुट्‌टी मिल जाएगी? दूसरी बात यह कि अभी इन्‍टरनेट पर खबरें पढ़ने वालों की संख्‍या कम है साथ ही न्‍यूजपेपर एक रूपए से तीन-चार रूपए में कई पृष्‍ठों का मिल जाता है। हमारे यहाँ के कथित पत्रकारों की पहचान उनके ‘बैनर' से है खबरें छापकर हर तरह से ‘कुछ न कुछ' यानि शोहरत और माता श्री लक्ष्‍मी जी की प्राप्‍ति करते हैं। जिनके अखबार ‘पापुलर' नहीं हैं उनका प्रसार कम है उसकी एकाध प्रति बचाकर सम्‍बन्‍धित को दिखाते हैं.......आदि।

एक सज्‍जन हैं कल ही उनको फोन किया और रेनबोन्‍यूज आफिस आने का आमंत्रण दिया- वह बोले आप ही अमुक दुकान पर आ जाओ। ताज्‍जुब हुआ कि तहसील/ब्‍लाक स्‍तरीय पत्रकारों का पत्रकारिता का यह भी एक नायाब तरीका है। मैंने तो उन्‍हें वेबन्‍यूज से सम्‍बद्ध करना चाहा था उल्‍टे वह सड़क छाप निकले मुझे ही चाय की दुकान पर बुलाया। शायद उन्‍हें मेरे बारे में जानकारी नहीं होगी। बाद में उन्‍हें एस0एम0एस0 के जरिए रेनबोन्‍यूज से जोड़ने का संदेश भेजा। नो रिप्‍लाई मैं खामोश हो गया, फिर अब किसी गँवईं पत्रकार को हाईटेक पत्रकारिता के लिए ‘आफर' नहीं दूँगा ऐसा मेरे मन में विचार आया।

आज कुछ पत्रकारों से बात हुई मैंने उनके समक्ष इस बात को पेश किया। वह बोले सर! हर आम आदमी (पाठक) की क्षमता नहीं है कि वह इन्‍टरनेट पर वेबपोर्टल पर खबरें विचार पढ़ें साथ ही अभी अपना जिला इतना विकसित नहीं हुआ है कि प्रेस/मीडिया से जुड़े लोग ‘नेट' का ज्ञान रखते हों। मेट्रो एवं बड़े शहरों में इसका प्रचलन है। मैंने कहा डियर्स महाराष्‍ट्र, राजस्‍थान, मध्‍यप्रदेश, छत्‍तीसगढ़, बिहार आदि प्रान्‍तों के छोटे शहरों में लेखकों, पत्रकारों के मेल तो आते हैं, ऐसा अपने उत्‍तर प्रदेश में क्‍यों नहीं है? उनका जवाब था कि दस बीस वर्ष में यहाँ के लोग भी वैसा हो जाएँगे-कहना पड़ा भाइयों तब तक जमाना और बदल चुका होगा। वह लोग बोले छोड़िए आप के साथ बाह्‌य प्रान्‍तों के लोग तो जुड़े हैं, इन लोगों को लेकर परेशान होने की जरूरत नहीं है। मैं चुप हो जाता हूँ।

एक सीनियर हैं उन्‍होंने मुझसे कहा कि डियर तुम अकारण टेढ़ी पूँछें सीधा करने का प्रयास करते हों। कई सदी बीत जाएगी पूँछें सीधी नहीं होंगी। उन्‍होंने एक बात और कहा वह यह कि इस बेरोजगारी के युग में पढ़े-लिखे और अल्‍पज्ञों ने पत्रकारिता को अपना पेशा बना लिया है। वह जो कुछ भी कर रहे हैं, उनमें उनके स्‍वार्थ की सिद्धि होती है मसलन धनोपार्जन। यही नहीं ऐसे लोग नेताओं और सरकारी अफसरों की खुशामद करके कुछ न कुछ अपने काम भर का कमा लेते हैं, ऐसों को तुम ‘वेब' लाइन में लाने की कोशिश कर रहे हो। सीनियर की बात कुछ हद तक समझ में आ गई और मैंने अपना ध्‍यान ऐसे पत्रकारों की तरफ से हटा लिया जो ‘मजबूर' हैं।

जी हाँ छोटे कस्‍बे और शहरों के पढ़े-लिखे बेरोजगार समाज में अपनी पहचान कायम रखने के लिए ‘प्रेस/मीडिया' से सम्‍बद्ध होते हैं और तरह-तरह के हथकण्‍डे अपना कर ‘पैसा' कमाते हैं, क्‍योंकि जिस ‘बैनर' के लिए काम करते हैं, वह इनके हाथ पर एक धेला नहीं रखता है, बस एक परिचय-पत्र और विज्ञापन में कमीशन। इससे काम नहीं चलने वाला। इन बेचारों के अलावा भीं कुछ ऐसे ‘मगरूर' कथित पत्रकार हैं जो हाँकते तो लम्‍बी चौड़ी हैं, लेकिन जब उनसे कहा जाए कि इस पर एक ‘स्‍टोरी' लिखो तब वह ‘धोबी' बन जाते हैं, जो कहने पर ‘गधे' पर नहीं बैठता है। वैसे एक बात बता दूँ कि ये भी बेचारे हैं। ये धोबी, गधा और धोबी का कुत्‍ता, हलवाई का ऊँट सब कुछ हैं। माननीयों, अफसरों और दाताओं के लिए हुकुम का दलिद्‌दर बने हुए हैं।

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1 blogger-facebook:

  1. धोबी गधे की सवारी करना ही नहीं जानता, या फिर उसे भय सताता है कि कहीं गधा बिदक गया तो ....
    वाह..क्या खूब ...कटाक्ष किया है...

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