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April, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

प्रभुदयाल श्रीवास्तव की बाल कविता - मुन्ना भैया

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मुन्ना भैया कितने अच्छे मुन्ना भैया कितने पक्के नहीं कहीं से भी दिखते हैं किसी तरह के चोर उचक्के । सबसे ह‍ंस हंसकर मिलते हैं बनते दोस्त सभी के पक्के करते सदा मदद सबकी हैं खाना पड़ें भले ही धक्के । सुबह सुबह ही योगा करते तभी रखे हैं लाल गुलक्के बात बात पर खूब हंसी के रोज लगाते चौके छक्के । उन जैसे मिलते दुनियाँ में हैं दुनियाँ में इक्के दुक्के सदा व्यस्त रखते हैं खुद को नहीं बैठते कभी दुबकके । सीखो हरदम चलते रहना रुकना नहीं हरके थकके करके अच्छे काम दिखाना रह जायें सब हक्के बक्के ।। --

यशवन्‍त कोठारी का आलेख - भारतीय रेल की कहानी

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भारत में स्‍थल यातायात का प्रमुख साधन रेल गाड़ी ही है। रेलें भारतीय जन मानस में रची बसीं हुईं हैं। कई लोक गीतों में रेलों, रेल यात्राओं आदि का वर्णन किया जाता हैं। फिल्‍मों में, दूरदर्शन धारावाहिकों में, उपन्‍यासों और कहानियों में रेलें एक महत्‍वपूर्ण विषय हैं। भारतीय रेलों का विश्व में दूसरा व एशिया में पहला स्‍थान है। भारत में सर्वप्रथम रेल 1853 में मुम्‍बई से थाणे के मध्‍य चली। यह रेलवे मार्ग 34 किलोमीटर लम्‍बा था, लेकिन विश्व में पहली रेल 1830 में लिवर पूल से मानचैस्‍टर तक चली। उस समय लोगों के दिलो-दिमाग में रेलों की संचालन व्‍यवस्‍था को लेकर कई शक थे, मगर धीरे-धीरे रेलें सम्‍पूर्ण यातायात व्‍यवस्‍था में सबसे महत्‍वपूर्ण हो गयीं। भारत में प्रथम रेल लाइन का निमार्ण 1948-49 में हावडा-रानीगंज (पश्चिम-बंगाल)में शुरू हुआ। इस समय भारत में कुल 9 रेलवे क्षेत्र हैं। रेलवे बोर्ड सम्‍पूर्ण व्‍यवस्‍था को देखता है। इसमें 6 सदस्‍य होते हैं। संसद में 1924-25 से ही रेलवे बजट अलग से प्रस्‍तुत किया जाने लगा। 1929 में प्रथम विद्युत रेल मुम्‍बई से पूणे तक चली। देष भर में आजकल एक ही प्रकार की रेल लाईन…

एस के पाण्डेय की लघुकथा - पागलपन

पागलपन “वह सिर्फ मेरी है। उसके और मेरे बीच में में कोई आया तो उसकी खैर नहीं.....।“ मोहन रामू से यह सब बोले जा रहा था। रामू बोला “ आखिर मैं क्यों आने लगा किसी के बीच में। मुझसे इन बातों से कोई मतलब नहीं है। मैं यहाँ पढ़ने आया हूँ। न कि किसी चक्कर में पड़ने। मेरे समझ में कुछ नहीं आ रहा है कि तुम मुझे क्यों लेक्चर दिए जा रहे हो।“ मोहन बोला “मुझे गोली दे रहे हो। तुम क्यों आने लगे किसी के बीच में। बताओ तो जरा पुस्तक के ऊपर यह क्या और क्यों लिख रखा है ? ” यह कहकर मोहन ने रामू से पुस्तक छीन लिया। अब तक कई लड़के वहाँ इकट्ठा हो गए थे। सबने देखा पुस्तक के आवरण पर “पीपी” लिखा है। मोहन अब और बिगड़ चुका था बोला “ क्यों बे ‘पीपी’ लिखकर घूम रहा है और कहता है कि मुझे किसी चक्कर में नहीं पड़ना है।“ रामू बोला “ जैसे तुम अपने हाथों में, किताबों और कापियों में पीपी लिखकर घूमते हो उसी तरह सबको समझते हो। तुम्हें हर जगह बस पीपी, पीपी ही दिखाई पड़ती है। लेकिन यह देख यह फिजिक्स प्रैक्टिकल की पुस्तक है। मेरे पीपी का मतलब फिजिक्स प्रैक्टिकल है न कि पुष्पा पाठक। मोहन ने किसी तरह रामू के गिरेवान से हाथ हटाया। सभी ल…

उमेश कुमार चौरसिया की लघुकथाएं

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अपराधकुछ लोग बतिया रहे हैं - ‘तुम्‍हें पता है वहां अपराध कम हो रहे हैं।‘ ‘अच्‍छा ! .......हमारे यहां तो दिन पर दिन बढ़ ही रहे हैं।‘ ‘वहां का कानून बड़ा कठोर है ना।‘ ‘तभी !.......यहां तो कानून का किसी को डर ही नहीं।‘ ‘पता है वहां अभी एक उच्‍चाधिकारी को भ्रष्‍टाचार के आरोप में फांसी दी गई है।‘ ‘और यहां............. दुर्दान्‍त आतंकवादी की भी फांसी भी रोक दी गई है।‘ सस्‍ताआज बाजार में बड़ा हल्‍ला हो रहा था। सुना है मंहगाई में कुछ कमी हुई है। बड़े मैदान पर चल रही सभा में नेताजी जोर-जोर से बता रहे थे-‘‘ये हमने कर दिखाया है.....रसोई गैस में 20 और पेट्रोल-डीजल में 5-5 रूपये की कमी की है........हवाई जहाज का किराया भी हमने 30 प्रतिशत कम कर दिया है............जमीनों की कीमतें और सीमेंट-सरिये की कीमतें भी कम हो रही हैं........हमने जनता की सुविधा का पूरा ध्‍यान रखा है............इससे गरीब जनता को राहत मिलेगी...........।‘‘ किसना दिन भर ठेले पर माल ढ़ोता यह सब सुनकर बहुत खुश था। वह सोच रहा था-‘‘आज मेरी मजूरी में से चार-पांच रूपये तो बच ही जाएंगे।‘‘ शाम को वह जल्‍दी-जल्‍दी राशन की दुकान पहुंचा। वहां…

नागेश पांडेय 'संजय' की बाल कविता - आओ पेड़ लगाएँ

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सारे जग के शुभचिन्तक, ये पेड़ बहुत उपकारी। सदा-सदा से वसुधा इनकी ऋणी और आभारी। परहित जीने-मरने का  आदर्श हमें सिखलाएँ। फल देते, ईंधन देते हैं, देते औषधि न्यारी। छाया देते, औ‘ देते हैं सरस हवा सुखकारी। आक्सीजन का मधुर खजाना भर-भर हमें लुटाएँ। गरमी, वर्षा, शीत कड़ी ये अविकल सहते जाते, लू, आँधी, तूफान भयंकर देख नहीं घबड़ाते। सहनशीलता, साहस की ये पूजनीय  प्रतिमाएँ। पेड़ प्रकृति का गहना हैं, ये हैं श्रृंगार धरा का। इन्हें काट, क्यूँ डाल रहे अपने ही घर में डाका। गलत राह को अभी त्याग कर सही राह पर आएँ। -- डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'निकट रेलवे कालोनी ,  सुभाष नगर  ,  शाहजहाँपुर- 242001.  (उत्तर प्रदेश, भारत)  परिचय  डा. नागेश पांडेय 'संजय' , जन्म: ०२ जुलाई १९७४ ; खुटार ,शाहजहांपुर , उत्तर प्रदेश . माता: श्रीमती निर्मला पांडेय , पिता : श्री बाबूराम पांडेय ;  शिक्षा : एम्. ए. {हिंदी, संस्कृत }, एम्. काम. एम्. एड. , पी. एच. डी. [विषय : बाल साहित्य के समीक्षा सिद्धांत }, स्लेट [ हिंदी, शिक्षा शास्त्र ] ;  सम्प्रति : प्राध्यापक एवं विभागाद्यक्ष , बी. एड. राजेंद्र प्…

प्रभुदयाल श्रीवास्तव का बालगीत

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प्यारा घोड़ा          घोड़ा है भाई घोड़ा है
         कितना प्यार घोड़ा है
         मुंबई से दिल्ली तक का
         उसने रस्ता जोड़ा है|          टिक टिक टिक टिक चलता है
         जोर जोर से हिलता है
         जैसे ही मारो हंटर
         कूदे और उछलता है
         उछलकूद करने में ही
         घर का मटका फोड़ा है|          पल में चेन्नई पहुंचाता
         उड़कर कोलकाता जाता
         आसमान में उड़ते ही
         फर फर फर फर फर्राता
         मेरे विश्वासों को भी
         कभी न उसने तोड़ा है|          जहां हुई मेरी इच्छा
         पल भर में पहुंचा देता
         गुल्ली टुल्ली अम्मू से
         तुरत फुर‌त‌ मिलवा देता
         दादा दादी चाचा से
         मीठा रिश्ता जोड़ा है|           दूध मलाई खाता है
          हँसता है मुस्काता है
          जैसे देखे रसगुल्ला
          खाने को ललचाता है
          खड़े खड़े ही बेचारा
          सो लेता वह थोड़ा है|        कहीं कहीं पर अड़ जाता
      सब पर भारी पड़ जाता
      नहीं मानता कहना फिर‌
      कसकर जिद्द पकड़ जाता
      कभी कभी तो गुस्से में
      खाना पीना छोड़ा है|       मैं उसको नहलाती हूं
   …

मिलन चौरसिया की कविता : ऐसा हुआ न कभी पहले

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दिल मेरा सम्हाले नहीँ सम्हले, ऐसा हुआ ना सनम कभी पहले । दिल मेरा ये मेरा नहीँ लगता, इसपे जोर भी मेरा नहीँ चलता, क्या जतन करुँ कैसे ये सम्हले । ऐसा हुआ ना सनम कभी पहले ॥ अब ख्वाबोँ मेँ आने लगे हो, आग दिल मेँ लगाने लगे हो, तेरी बातोँ से अब नहीँ बहले । ऐसा हुआ ना सनम कभी पहले ॥ बोलो कैसे फरेब दूँ मैँ इसको, कभी दे ना सका जो मैँ किसी को, क्या करुँ कैसे पगला ये सम्हले ।ऐसा हुआ ना सनम कभी पहले ॥ नादाँ है हकीकत ना समझे, चाँद मांगे ये कीमत ना समझे, शायद ठोकर लगे तो ही सम्हले । ऐसा हुआ ना सनम कभी पहले ॥ (मिलन चौरसियाः मऊःउत्तर प्रदेश )

सुमित शर्मा की ग़ज़ल

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ग़ज़ल अब शाहों का सिंहासन, जल्‍दी थर्राने वाला है, मिजाजे आम हैं बिगड़ा, बवंडर आने वाला है। बड़ी ही देर से सही, मगर आवाज तो आई, यहाँ उजले लिबासों में छिपा हर हाथ काला है। हया बेच कर खाई, अमीरों और वजीरों ने, तमाशे हैं यहाँ सस्‍ते, मगर महगाँ निवाला है। हमें ठंडा समझने की, तुमने कैसे की गुस्‍ताखी, जवां हैं मुल्‍क हिन्‍दोस्‍तां, अभी तनमन में ज्‍वाला है। जाओगे अब कहाँ बचकर, यहीं पर टेक लो माथा, यहाँ आवाम मस्‍जिद हैं, यहाँ जनता शिवाला है। -- कवि परिचय- नाम - सुमित शर्मा जन्मतिथि - 31 जनवरी 1992 पता - तहसील चौराहा,गायत्री कालोनी, खिलचीपुर, जिला- राजगढ़(म.प्र.) शिक्षा - बी.ई.-तृतीय वर्ष (कम्‍प्‍यूटर साइंस) अध्‍ययनरत साहित्‍यिक रचनाएँ - चलती रहेगी मधुशाला(काव्‍य) , रिश्ते(उपन्‍यास), 35 कविताएँ/गजलें, लघु कहानियाँ । (सभी अप्रकाशित)

शशांक मिश्र ‘‘भारती'' की बाल कथा - दादा जी की चिन्ता

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‘‘ दोस्‍तों , हमारा देश महान है, जहां अनेक महापुरुषों ने जन्‍म लिया है। वहीं पक्षियों की बात करने वाल सलीम अली की जन्‍मभूमि भी यह भारत है; जिन्‍होंने पक्षी विज्ञान पर अनेक पुस्‍तकें लिखी हैं। संसार में ऐसे देश भी हैं। जिनमें पशु-पक्षियों पर मुकदमा चलाया गया है।'' चेतना ने सभा का प्रारम्‍भ करते हुए कहा । ‘‘ बिल्‍कुल सही कहा चेतना ने , हमारे देश के हरियाणा और राजस्‍थान में रहने वाले विश्‍नोई सम्‍प्रदाय के अनेक लोग वनों तथा पशुओं की रक्षा के लिए अपने प्राणों तक को तिनके के समान मानते थे। जब जोधपुर नरेश ने अपने महल के निर्माण के लिए लकड़ी प्राप्‍ति हेतु वृक्षों को काटने की आज्ञा दी तो उनकी आज्ञा के विरुद्ध विश्‍नोई सम्‍प्रदाय के करीब 300 स्‍त्री-पुरुषों ने ‘‘ पहले हमारे शरीर को काटो,, फिर पेड़ काटना'' कहते हुए अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। धन्‍य थे वे लोग।'' उपदेश ने बताया , -उपदेश भैया की बात सुनकर अगर आज के मानव को देखते हैं; तो उस समय की और आज की स्‍थिति में जमीन- आसमान का अंतर पाते हैं।'' प्रेरणा ने कहा। -‘‘ प्रेरणा , अंतर तो है। आज का मानव पेड़ों …

एस के पाण्डेय का व्यंग्य : चाय पीने-पिलाने के फायदे और नुकसान

हिंदुस्तान में बहुत पहले हर घर में गाय रखी जाती थी। और आज किसी-किसी घर में गाय मुश्किल से मिल पाती है। गाय भले ही मुश्किल से मिलती हो लेकिन हर घर में अब चाय रखी जाती है। कोई बिरला ही घर होगा जहाँ चाय न हो। मिले न मिले वह दूसरी बात है। पहले गाय थी और अब चाय है। इसका मतलब यह नहीं है कि जहाँ गाय होगी वहाँ चाय नहीं होगी। फिर भी जब हर घर में गाय थी तब हिंदुस्तान में चाय नहीं थी। और आज चाय है तो हर घर में गाय नहीं है। कुछ विद्वान इसमें कुछ रहस्य होने की बात करते हैं। इनका मानना है कि कहीं न कहीं कोई लिंक जरूर है। यह गुत्थी विद्वानों के लिए छोड़कर हम आगे बढ़ते हैं और अपने समझ की बात बताते हैं। गाय से जितने फायदे थे। उतने चाय से नहीं है। गाय से कोई नुकसान नहीं था। लेकिन चाय से नुकसान भी है। फिर भी समय की बात है। आज चाय का समय है। पहले गाय का था। आज जिस घर में दूध नहीं भी होता है वहाँ भी चाय मिल जाती है। हिंदुस्तान में गाय-भैंस नहीं भी रहेंगी तो भी चाय मिलेगी। केवल काली नहीं दूध वाली भी। यहाँ जुगाड़ से दूध जो बन जाता है। खड़िया घोलकर। गाँव से लेकर शहर तक चाय की पहुँच है। बहुत से गांवों में तो चाय…

रत्‍नकुमार सांभरिया की कहानी - खेत

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बूढ़ा के लिए खेत था। सोलह आना सच यह था कि वह दो सौ वर्ग गज का प्‍लाट था, उसके 25-25 वर्ग गज के आठ क्‍यार बनाये हुये थे। क्‍यार-क्‍यार न्‍यारी फसल उगी थी। चना, जौ, गेहूं, गजरा, पालक, धनिया मैथी। आठवें क्‍यार में बूढ़ा की झोपड़ी थी।प्‍लाट के तीनों ओर बिल्‍ड़िंगें बनी हुई थीं। सामने तीस फीट की सड़क थी। हवा पानी दोनों इसी राह आते थे, बूढ़ा के लिए। गेट के नाम पर बबूल की छाजन का फाटक था। आड़, चाहे बाड़ हो। प्‍लाट के आये दिन खरीददार आते। बढ़-चढ़कर मोल भाव करते। बूढ़ा से जिदयाते-‘‘बाबा, अकेले जीव हो। बावली बात छोड़ो। दाम बोलो। दाम पकड़ो।‘‘ बूढ़ा खुद्‌दार। बूढ़ा जज्‍बाती। बूढ़ा खानदानी। बेलाग कहता-‘‘शरीर का सौदा साई, होवै छै कांई।''बूढ़ा 74 वर्ष की अपनी अवस्‍था को गिनता गामता तक न था। वह अपने क्‍यारों में निलाई करता। खोदी करता। पानी बलाता। खुद अपनी रोटी पानी करता। रात हुई। झोंपड़ी में बिछी खाट पर लेट जाता। रात गहराने लगती। बूढ़ा अतीत की स्‍मृतियों में गुम होने लगता। अतीत और आज, दो धु्रवों की तरह थे, आज। आकाश, चांद-सितारों को नापता बूढ़ा अपनी झोल खाट पर गोल हुआ सो जाता, आसमान में परवाज …

डी0एल0 खन्‍ना ‘प्‍यासा' की कविताएँ - क्यों आजकल उनकी वाणी में, फूल कम, अंगारे ज्‍यादा हैं

जीवन क्रमबचपन गुजारा खेले में, मेले में, मां की झोली में बाप की बाहों में यौवन गुजारा प्‍यार की मस्‍ती में वंश की वृद्धि में आर्थिक समृद्धि में अधेड़ अवस्‍था गुजारी बच्‍चों के विवाह में उनके परिवार में घर के संसार में वृद्धावस्‍था गुजारी अवहेलना में, उपेक्षा में दर्द में इलाज में गुजरे हुए इतिहास में भूल गये हम नश्‍वर संसार को प्रभु के नाम को मृत्‍यु के सत्‍य को जीवन के अंत को मोक्ष की राह को प्‍यारप्‍यार का कोई भी मजहब नहीं होता प्‍यार की कोई भी भाषा नहीं होती प्‍यार में कुछ भी असंभव नहीं होता प्‍यार में कोई भी बंधन नहीं होता प्‍यार मौत से कभी डरता नहीं प्‍यार मौत से कभी मरता नहीं प्‍यार में लुट जाती है सल्‍तनतें प्‍यार में बन जाते है ताजमहल प्‍यार जीवन का सुरीला गीत है प्‍यार सांसों का मधुर संगीत है प्‍यार यौवन का मधुमास है प्‍यार ईश्‍वर का एक वरदान है मैंने देखा हैधर्म के नाम पर मैंने धर्म को ही मिटते देखा है जातिवाद के विषधर को मैंने देश की अखंडता को डसते देखा है एक संतान की चाहत में मैंने रात भर, बांझ को, सिसकते देखा है आतंक की दहशत में मैंने बंद तालों में खौफ देखा है ताजमहल के …

मनोज मिश्र का आलेख - भारत का मेडिकल टूरिज्‍म और ओबामा की चिन्‍ता

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यह मात्र संयोग नहीं है कि भारत के विरूद्ध सुपर बग तथा अमेरिकी राष्‍ट्रपति बराक ओबामा की अमेरिकियों के सस्‍ते इलाज के लिए भारत या मैक्‍सिकों जाने की चिन्‍ता हो, दोनो ही मामलों में भारत के विरूद्ध कुप्रकार की गन्‍ध तो मिलती ही है और साथ ही भारत की धीरे-धीरे बढ़ती ताकत का एहसास भी पूरी दुनिया महसूस कर रही है। ज्ञान के युग में जिस सर्वाधिक संसाधन की आवश्‍यकता होती है वह मानव संसाधन है, जिसकी पूंजी भारत की झोली में नैसर्गिक तौर पर है। उदारीकरण के बाद आई टी की धूम ने भारतीय मेधा की पहचान अन्‍तर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर पहली बार कराई। आई टी के साथ-साथ दवा उद्योग, वाहन उद्योग सहित कई उद्योगों ने अन्‍तर्राष्‍ट्रीय पहचान इन बीते 20 वर्षों में देश की मेधा ने बनाई। इन सारे उद्योगों या इनके इतर अन्‍य मामलों में भारत की वैश्‍विक बढ़त का मुख्‍य कारण भारतीय मेधा ही थी। अमेरिका सहित सारे विकसित देश इस उभरती भारतीय क्षमता को हतोत्‍साहित करने का प्रयास नये-नये तरीकों से करते रहते है। अमेरिका द्वारा आऊट सोर्सिंग पर प्रतिबन्‍ध या आऊट सोर्स कराने वाली कम्‍पनियों पर कर वृद्धि का मामला, एच1बी बीजा को आठ गुना महंग…

लक्ष्‍मीकांत त्रिपाठी की कहानी - एक रात

प्रसाद और रूबी वापस आ चुके थे. चंडीदास ने चपरासी को भेजकर प्रसाद को अपने चैंबर में बुलवाया. ‘‘ नमस्‍ते सर! '' कहने के बाद प्रसाद चंडीदास के ठीक सामने बैठ गया. चंडीदास प्रसाद को एकटक देखने लगा. जैसे वह किसी अजनबी को देख रहा हो. ‘‘ और... ‘‘टूर'' कैसा रहा ? '' अचानक चंडीदास ने प्रसाद से पूछा. ‘‘ सुपर्व! मजा आ गया... '' प्रसाद ने चहकते हुए कहा. ‘‘ आज मैं तुम्‍हें दावत देता हूँ... शाम को ब्‍लू स्‍टार चलते हैं...'' चंडीदास ने मुस्‍कुराते हुए कहा. ‘‘ किस खुशी में सर!...'' ‘‘ बस...ऐसे ही...क्‍या मैं तुम्‍हें दावत नहीं दे सकता ?...'' चंडीदास ने प्रसाद को रहस्‍यपूर्ण दृष्‍टि से देखते हुए कहा. ‘‘ क्‍यों नहीं सर!.. '' प्रसाद ने धीरे से कहा. रात में ठीक साढ़े आठ बजे चंडीदास और प्रसाद होटल ब्‍लू स्‍टार के अन्‍दर दाखिल हुए. दोनों सीधे बार में चले गए. फिर लड़खड़ाते हुए रेस्‍टोरेंट में आकर खाना खाने लगे. ‘‘ तुम्‍हें पूनम के बारे में भी कुछ सोचना चाहिए!...'' एकाएक चंडीदास ने गंभीर वाणी में कहा. ‘‘ क्‍या मतलब... ? '&…

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रचनाकार

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