बुधवार, 6 अप्रैल 2011

आर के भारद्वाज की कहानी : बे-ताल कथा

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विक्रमादित्‍य ने हठ न छोड़ा, शव को पेड से उतार अपने कन्‍धे पर रख आगे बढने लगा, तब शव में स्‍थित बेताल ने कहा '' राजन, तुम अपने हठ के पक्‍के हो, कई बार तुम शव को उठाकर आगे बढ़े, लेकिन मै फिर अपनी बातों में तुम्‍हें बहलाकर फिर पेड़ पर आ बैठता हूं । चूंकि रास्‍ता लम्‍बा है अतः तुम्‍हें थकान महसूस न हो मैं तुम्‍हें रामनगर राज्‍य की कथा सुनाता हूं।

बेताल ने कहना शुरू कियाः- राजन, रामनगर राज्‍य काफी विशाल था, पहले वहाँ पर राजतन्‍त्र था, कुछ समय के बाद विदेशी आक्रामकों ने आकर राम नगर के राजाओं को हराकर अपना राज्‍य स्‍थापित कर लिया। मूल राजा अब काफी कम हो गये थे । एक बार एक शासक की लड़की बीमार पड़ी, उसने एक विदेशी वैद्य को बुलाकर अपनी लड़की के इलाज के लिये कहा। विदेशी वैद्य ने अपनी यह शर्त रखी कि मेरे देश के व्‍यापारियों को यहाँ पर व्‍यापार करने की छूट दे दी जाये तो मैं आपकी लड़की का इलाज कर सकता हूं। शासक ने उसे अनुमति दे दी। विदेशी व्‍यापारियों ने अब वहाँ पर न सिर्फ व्‍यापार करना शुरू किया, बल्‍कि धीरे धीरे उन्‍होंने वहाँ पर अपना राज्‍य स्‍थापित कर लिया। वह राम नगर के वासियों को विदेशी समझने लगे तथा उन पर तरह तरह के अत्‍याचार भी करने लगे, रामनगर की जनता उनके अत्‍याचारों से त्रस्‍त हो गई थी। कुछ नौजवानों ने तत्‍कालीन शासकों के विरूद्ध आवाज उठायी उन्‍हें कुचल दिया गया। लेकिन नौजवान जो आग लगा गये थे रामनगर के कुछ वीर नौजवानों ने उस आग को बुझने नहीं दिया, फिर रामनगर के जनता में से ही एक पढ़े लिखे व्‍यक्‍ति ने उसकी कमान संभाल ली, उसके प्रयासों से ही विदेशी शासकों को रामनगर छोड़ कर जाना पड़ा। उस व्‍यक्‍ति को लोग आदर से महात्‍मा कहने लगे।

रामनगर अब विदेशी शासकों से मुक्‍त हो चला था, महात्‍मा ने किसी भी पद पर राज्‍य करने के लिये मना कर दिया। महात्‍मा तथा उसके जैसे कितने ही निस्‍वार्थ व्‍यक्‍तियों ने रामनगर में प्रजातन्‍त्र कायम किया। अब जनता का राज था, उन्‍हीं के चुने व्‍यक्‍ति शासन किया करते थे, यह प्रणाली इतनी कारगर साबित हुई कि लोग अब दिन पर दिन तरक्‍की करने लगे। लेकिन रामनगर के ही एक व्‍यक्‍ति ने महात्‍मा को गोली मार दी। सारा रामनगर शोक में पड गया। फिर जनता के ही चुने व्‍यक्‍ति राज करने लगे, यह चुने हुए व्‍यक्‍ति पांच वर्ष के लिये होते थे। समय गुजरता गया लोग प्रजातन्‍त्र के आदी हो चुके थे।

प्रजातन्‍त्र के बाद कुछ लोग स्‍वार्थी हो गये, जिन्‍हें जनता चुन कर भेजती थी वही लोग अब बेइमान हो गये, उन्‍हें जनता के दुख दर्द से कोई मतलब नहीं था, सिर्फ अपनी भाषण की शैली से ही वह भोली जनता को सुहावने सपने दिखाते, हम यह कर देगें, हम वह कर देगें, हमने यह किया हमने वह किया। इस प्रकार भोली जनता उन्‍हें फिर चुनकर भेज देती, वहाँ जाकर वह फिर अपने घर भरने लग जाते। जब जनता को यह पता चला कि हमारे द्वारा चुने हुये लोग काफी पैसा जमा करने लगे हैं तो उन्‍होंने इस के विरोध में आवाज उठायी, अब शासक लोग अपना पैसा दूसरे देशों में जमा करने लगे। कुछ शासकों ने तो इतने पैसे जमा कर लिये कि आगे आनी वाली उनकी दस पीढ़ी आराम से बैठकर खा सकती थी, कभी कोई पकड़ा जाता तो वह कहता कि मुझे विरोधी दल ने फंसाया है। जनता उसकी बातों में आ जा जाती और फिर उन्‍हें चुनकर शासन करने के लिये भेज देती। लेकिन कहावत है कि चोर चोरी से जा सकता हैं लेकिन हेराफेरी से नहीं जा सकता। चुने हुये लोग अपनी हरकतों से बाज नहीं आते। विरोधी कई बार आवाज उठाते तो उनकी आवाज भी दब जाती। जनता इन बातों से आजिज आ चुकी थी। अब जनता ने विरोधी दलों को शासन करने के लिये भेजना शुरू किया। चूंकि इन पचास सालों में उन्‍हें विरोध करने की आदत पड़ गयी थी अतः सत्‍ता में आने के बाद वह पहली सरकार के किये गये घपलों की जॉच में ही अपने पांच साल गुजार देते ।

अब जनता ने सिर्फ ''छंटे'' हुये लोग शासन में भेजने शुरू किये। लेकिन अब हुआ यूं कि वहाँ पर सत्‍ता में आने के लिये जितनी संख्‍या की दरकार थी वह पूरी नहीं होती थी जोड जुगाड़ लगाकर अधिक संख्‍या वाले सत्‍ता पर बैठते लेकिन उनके सहयोगी सिर्फ मलाईदार पदों की मांग करते, इधर उनकी संख्‍या वाले लोग भी मलाईदार पद ही मांगते, नतीजा यह निकलता कि संख्‍या बल कम होने पर सरकारें दो-तीन सालों में ही गिर जाती। बड़ी मुश्‍किल घड़ी थी, जनता पर टैक्‍स का इतना जोर पड़ गया कि उनकी कमाई सिर्फ टैक्‍सों पर ही खर्च हो जाती। इधर सत्‍ता पर बैठने वाले लोग घपलों पर घपले करते जाते, दो चार साल की जेल काट आते और फिर किसी भी तरह से सत्‍ता पर जा बैठते। जनता के सामने कई घोटाले आये, ताबूत घोटाला, स्‍टाम्‍प घोटाला, चारा घोटाला, तोप घोटाला, जमीन घोटाला, 2 जी स्‍पैक्‍ट्रम धोटाला, सीडब्‍लूजी घोटाला, सड़क घोटाला,कैन्‍टीन घोटाला,नौकरी घोटाला,बिजली के लिये विद्युत गृह बनाने का घोटाला कहने का मतलब यह कि जितने लोग संसद में थे उसे कहीं अधिक घोटाले थे।

इन सब घोटालों से जनता त्रस्‍त होती तो आयोग बैठा दिये जाते। एक आयोग काम नहीं करता तो उसके ऊपर दूसरा आयोग बैठा देते वह भी काम नहीं करता तो तीसरा आयोग, चौथा आयोग, जनता यह तक भूल जाती कि हमने किस घोटाले के लिये जांच बैठायी थी। इधर भ्रष्‍टाचार अपनी पूरी ऊंचाई पर चला गया, जिसे भी जनता भेजती वह किसी न किसी प्रकार कोई घोटाला कर बैठता। समझ में नहीं आ रहा था कि किसे सत्‍ता में पंहुचाये।

जनता की परेशानी देखकर एक महात्‍मा वादी सज्‍जन आगे आये ईमानदार थे, देश को आजाद कराने में उनका काफी योगदान था, पूरी जनता उनके साथ थी, उन्‍होंने सत्‍ता पक्ष के विरोध में आवाज उठा दी, कई नेताओं को, बड़े अफसरों को अपना आसन छोड़ना पड़ा, लेकिन उनकी मुहिम अभी रूकी नहीं थी वह पूरे रामनगर को भ्रष्‍टाचार मुक्‍त करने के लिये आगे आये थे, सत्‍ता पक्ष की आंखों में नींद नहीं थी, तरह की आशंकायें उन्‍हें खा जा रही थी, इधर विरोधी दलों ने भी उन्‍हें अपना समर्थन देना शुरू कर दिया, अब एक बहुत बड़ा समाज उन महात्‍मावादी सज्‍जन के साथ था, सरकार उनकी कुछ मांगे मानती तो विरोधी दल उसमें अपना अहित देखते, लेकिन महात्‍मावादी सज्‍जन किसी की नहीं सुनते थे। इसका नतीजा भी अच्‍छा आने लगा। महात्‍मावादी सज्‍जन की गूंज अब सारे रामनगर की आवाज बन गयी थी। फिर एक दिन सुबह लोगों को पता लगा कि महात्‍मावादी सज्‍जन अपने कमरे में मरे पाये गये, सत्‍ता पक्ष अब निश्‍चित था। विरोधी पक्ष के चेहरे पर भी मुस्‍कान थी। अफसरों को भी चैन की सांस मिल गयी। अब लग रहा था कि उनके दिन बहुरने वाले हैं।

इतना कहकर बेताल चुप हो गया, थोडी देर बाद उसने कहा,'' राजन मैने तुम्‍हें रामनगर का हाल सुना दिया अब तुम इन प्रश्‍नों के उत्‍तर दो, यदि तुमने इन प्रश्‍नों के उत्‍तर नहीं दिये तो तुम्‍हारा सिर कटकर नीचे गिर जायेगा।

· पहला प्रश्‍नः- रामनगर में जब प्रजातन्‍त्र था तो सत्‍ता पक्ष के लोग बेईमान क्‍यों हो गये।

· दूसरा प्रश्‍नः- सरकार आयोग पर आयोग क्‍यों बैठाती गई।

· तीसरा प्रश्‍नः- जब जनता ही उन्‍हें चुनकर भेजती थी, तो वह जनता के साथ विश्‍वासधात क्‍यों करते थे ।

· चौथा प्रश्‍नः- सरकारी अफसरों को काफी मोटा वेतन मिलता था तो वह भ्रष्‍ट क्‍यों हो गये।

· पांचवा प्रश्‍नः- महात्‍मावादी का साथ विरोधी दल क्‍यों दे रहे थे।

· छटा प्रश्‍नः- महात्‍मावादी की हत्‍या किसने की।

· सांतवा प्रश्‍नः- रामनगर की जनता को भ्रष्‍टाचार से मुक्‍ति कैसे मिलेगी।

बेताल ने कहा राजन इन प्रश्‍नों के उत्‍तर दोः-

तब विक्रमादित्‍य ने कहा,'' बेताल सत्‍ता पक्ष के लोग इसलिये बेईमान हो गये कि उन्‍हें पता था कि हम कुछ भी करें हमारे विरोध में कोई नहीं बोलेगा, हम अपनी मर्जी का कानून बना लेंगे। उन्‍होंने पिछले वर्षो में इतना तो जान ही लिया था कि जनता को कैसे बहला कर अपना उल्‍लू सीधा कैसे किया जा सकता है। सरकार आयोग पर आयोग इसलिये बैठाती गई कि आयोग में उनके ही लोग थे, जितने भी रिश्तेदार थे सबको कुछ न कुछ काम तो मिलना ही था। वह जनता से कहकर आये थे कि सबको काम मिलेगा और इसकी शुरूवात उन्‍होंने अपने ही रिश्तेदारों से शुरू की। जनता के साथ विश्‍वासघात इसलिये करती थी कि वह सिर्फ पांच वर्षो के लिये आये थे, अगर जनता ने उन्‍हें दुबारा नहीं भेजा तो रोटी पानी कैसे चलेगी। सरकारी अफसरों को मोटी तन्‍खा मिलती थी फिर भी वह भ्रष्‍ट हो गये वह इसलिये कि नेता उन्‍हीं के माध्‍यम से खाते थे अगर नेता को एक करोड़ देना है तो दस लाख पर उनका भी अधिकार था फिर जैसे बड़े करते हैं छोटे उसका अनुकरण करते हैं जब नेताओं को कुछ नहीं हो रहा तो उन्‍हें क्‍या होगा आखिर उन्‍हें बचाने वाले भी तो सरकारी अफसर ही हैं। महात्‍मावादी सज्‍जन के साथ विरोधी दल इसलिये साथ हो गये जिससे जनता को पता चल जाये कि आने वाले समय में हमारा निस्‍वार्थ दल उनकी सेवा करेगा, और उन्‍हें अपना घर भरने का मौका मिलेगा। महात्‍मावादी की हत्‍या सत्‍ता पक्ष,विरोधी दल, सरकारी अफसरों की टीम ने किया, क्‍योंकि उनका मुंह बन्‍द होते ही उनके काले कारनामे अब जनता के सामने नहीं आयेगें। बेताल यह आखिरी प्रश्‍न बहुत मुश्‍किल है और परीक्षा में कुछ ही प्रश्‍नों के उत्‍तर देने अनिवार्य होते हैं इस प्रश्‍न का उत्‍तर कोई नहीं दे सकता और देना भी नहीं चाहिये।

बेताल ने कहा, 'राजन तुम्‍हारे सारे प्रश्‍नों के उत्‍तर ठीक हैं, लेकिन तुम बोले क्‍यों, तुम्‍हें पता नहीं हैं कि प्रजातन्‍त्र में बोलना मना है, महात्‍मावादी सज्‍जन भी बोले थे और बोलते ही मौत को गले लगा लिया।

इतना कहकर बेताल फिर पेड़ पर जा बैठा ।

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RK Bhardwaj

151/1 Teachers’ Colony

Govind Garh,Dehradun\

(Uttarakhand)

e mail: rkantbhardwaj@gmail.com

3 blogger-facebook:

  1. बिल्कुल सटीक सत्य कथा है. महात्मावादी सज्जन बचे रहें...

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  2. बे -ताल कथा के माध्यम से भारद्वाज जी आपने कई युग समेट लिए हैं. आजादी के पूर्व का, फिर बापू की मौजूदगी और अंत में वर्तमान बेशर्म और दिगंबर राजनीति के छलावे.समय सापेक्ष काल खंड की सियासत की नूरां-कुश्तियां , निहित स्वार्थों की गलीज में लथपथ समीकरण और उस विषबेल के फलस्वरूप पैदा हुए जहरीले फलों के यक्ष प्रश्न. समाधान के उत्तर भी मिले. लिहाजा बेताल फिर से लटक गया अपनी डाल पर. रोचक कथा व् प्रस्तुतीकरण भारद्वाज जी ने किया है.बधाई.. मेरे ब्लॉग का अवलोकन करे. kishordiwase.blogspot.com

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