शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

मालिनी गौतम की कविता - एक पाती जीवनदात्री के नाम

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माँ..........ओss माँ........

तुम फिर क्यों नहीं बुला लेतीं

मुझे अपने पास........?

तुम्हारे आँचल की छाँव में

हर कठिन काम

हो जाता था कितना सरल

याद है तुम्हें.....

 

कितना बिदकती थी मैं

स्कूल जाने के नाम से,

हर कक्षा पास करने के बाद कहती.....

बस अब आगे नहीं पढूँगी

और हर बार

गर्मी की छुट्टियों में

तुम इस तरह बदलतीं मेरा मन

कि पहले ही दिन

दीदी की उँगली पकड़कर मैं

चल देती स्कूल....

 

हर बार जब-जब मैं निराश हुई/ठहरी

तुमने कहा...ठहरना नही बिटिया

आकाश के तारों को

चूमकर आना है तुम्हे.....

तुम्हारी उँगली पकड़े हुए मैं

चलती रही अनजानी,

अकेली पगडंडियों पर,

टेड़े-मेड़े रास्तों पर

जिनमें साथ चलने वाले

सहयात्री तो न थे

पर था तुम्हारा स्नेह भरा हाथ

अँधेरे आसमान को भेदकर

उस पार देखती तुम्हारी आँखें

तुम्हारी यादें......और तुम...सिर्फ तुम

मैं आगे बढ़ती गई....

 

तुम बना-बनाकर भेजती रहीं

मेरी पसंद का अचार/सॉस/मठरी

बुनती रहीं मेरे स्वेटर

सिलती रहीं मेरे सलवार-कुर्ते

मैं देती रही शिकस्त मंजिलों को

और गहराती गई चमक

तुम्हारी आँखों की

फिर एक दिन तुमने भी निभाया

दुनिया का दस्तूर

कर दिया मुझे विदा

अपने हृदय पर पत्थर रख...

 

आज सब कुछ है मेरे पास

नये रास्ते/नई मंजिलें/नई सफलताएँ...

पर सब कुछ है कितना अधूरा.....

क्योंकि तुम जो नहीं हो मेरे पास......

माँ..........ओss माँ........

तुम फिर क्यों नहीं बुला लेतीं

मुझे अपने पास........?

--

डॉ. मालिनी गौतम

4 blogger-facebook:

  1. धन्यवाद रवि जी, आज के दिन इस कविता को प्रकाशित करने के लिये ......मैं आपकी आभारी हूँ!

    उत्तर देंहटाएं
  2. amita kaundal6:13 pm

    बहुत सुंदर रचना है मेरे दिल की बात को आपने कविता में उतार दिया इस सुंदर कविता के लिए धन्यवाद और बधाई.
    सादर
    अमिता

    उत्तर देंहटाएं
  3. anant alok6:34 pm

    Malini ji Maan par bahut khoobsurat rachna aapne to divangat maan ki yat dila di thanx

    उत्तर देंहटाएं

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