शनिवार, 9 अप्रैल 2011

हरीश नारंग की रचना - भ्रष्टाचार की जय

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(यह रचना श्री अन्ना हजारे द्वारा चलाये जा रहे अभियान के समर्थन मैं है)

भ्रष्टाचार की जय

(तर्ज़वन्दे मात्रम)

 

बदल गया है आज ज़माना
रिश्वत का है राज सुनो
सच्चे का तो मुंह है काला
झूठा पहने ताज़ सुनो
भ्रष्टाचार की जय


डिग्री से सर्विस न मिलती
हरे नोट ही काम करें
धन्धे में जो करें घोटाला
जीवन भर आराम करें
चोरी डाका करे जो कोई
जग में ऊँचा नाम करें
भोले भाले की लुटती है
दोराहे पर लाज सुनो
सच्चे का तो मुंह है काला
झूठा पहने ताज़ सुनो ।
भ्रष्टाचार की जय---


मान व आदर खत्म हुए
सब काम बने अब जोरी से
अपने हक से पेट न भरता
चले गुज़ारा चोरी से
सेठ जी देखो भरें तिज़ोरी
घूस व रिश्वतखोरी से
सत्य धर्म को भूलो भैया
वक्त की अब आवाज़ सुनो
सच्चे का तो मुंह है काला
झूठा पहने ताज़ सुनो ।
भ्रष्टाचार की जय---

 

झूठ फ़रेब की बदबू आती
नेताओं के भाषण से
मिली बेकारी और महंगाई
प्रजातंत्र के शासन से
हाल यही जो रहा तो इक दिन
मिले गा पानी राशन से
दीन ईमान को भूली दुनिया
बन गइ धोखेबाज़ सुनो
सच्चे का तो मुंह है काला
झूठा पहने ताज़ सुनो ।
भ्रष्टाचार की जय---

हरीश नारंग

15, अरावली अपार्टमेंट्स

अलकनंदा, नई दिल्ली

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2 टिप्‍पणियां:

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