शशांक मिश्र ‘भारती' की कविता - गांव

एक-

यह हैं भारत के प्रदीप

जीवित है जहां पर

देश की संस्‍कृति अभी,

समय नहीं सोचने का है

भौतिकता के बारे में कभी।

 

दोः-

यह गंगा हैं भारत की

बहता है जिसमें

संस्‍कृति का अविरल प्रवाह,

जितना चाहो, ग्रहण करो किन्‍तु;

घटता नहीं है प्रवाह।

 

तीनः-

---

यही आज भी मूल भारत हैं

जहां बसती है देश की

दो-तिहाई जनशक्‍ति,

जिस पर आधारित है

देश की सामाजिक- सांस्‍कृतिक

भावी उन्‍नति।

 

चारः-

---

यह दूर हैं अभी भी

शिक्षा के पूर्ण प्रकाश से ,

पर-

दूर उस भौतिकता से भी

जिसने-रोक दिया है

देश को संस्‍कृति के विकास के

अवसरों से।

 

पांचः-

---

गांव

शहरी सभ्‍यता से पीछे हैं

किन्‍तु-

उच्‍चता पर हैं फिर भी

पहुंची नहीं हैं वहां

शहरी समस्‍याओं की जड़ें

अभी।

-----------

-----------

1 टिप्पणी "शशांक मिश्र ‘भारती' की कविता - गांव"

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.