बुधवार, 13 अप्रैल 2011

आर के भारद्वाज की कहानी - चोर कौन

चोरी हीरे की हो या खीरे की चोरी तो चोरी ही होती है। ममता के घर के सभी सदस्‍यों को लोग चोर ही कहते थे। हालांकि उनसे अगर पूछा जाये कि भाई ममता ने या उसके बच्‍चों ने तुम्‍हारा कुछ चुराया है तो शायद सबका एक सा ही जवाब होगा नहीं हमारा तो कुछ नहीं चुराया, फिर आप लोग इन्‍हें चोर क्‍यों कहते हैं। जवाब बडा अजीब सा मिलता है इनका बाप चोर था और चोर के बच्‍चे तो चोर ही होते है। लोगों की ममता और उसके बच्‍चों के प्रति इस दुर्भावना का पता लगाने के लिये ममता के जीवन की पृष्‍टभूमि में जाना होगा ।

ममता का पति एक बढई था, मेहनती था, अच्‍छा कुशल कारीगर था, लोग अपने यहॉँ काम कराने के लिये उसका इन्‍तजार किया करते थे जब उसका एक अनुबन्‍ध खत्‍म हो जाता तो तभी वह दूसरे अनुबन्‍ध पर काम करता था । लेकिन ममता के पति बढ़ई अनिल में एक खराबी थी उसे शराब पीने की बडी बुरी लत थी, शराब के लिये वह कुछ भी कर सकता था। जब उसके पास कोई दिहाड़ी नहीं होती थी तो वह अपनी शराब की लत के लिये लोगों का छोटा मोटा काम कर दिया करता था और मजदूरी के पैसे से अपनी शराब पी लिया करता था। ममता ने उसे कई बार उस लत तो छोड़ने के लिये कहा वह रोज सुबह तोबा कर लिया करता और शाम को फिर वही राग............. नशेो में डूबता हुआ घर आ पहुंचता। ममता समझा समझा कर हार गयी लेकिन अनिल ने न सुधरना था न सुधरा । इधर घर खर्च चलाना बडा मुश्‍किल हो गया। ममता के बच्‍चे छोटे थे, उनकी पढ़ाई लिखाई कपडे दवा दारू का प्रबन्‍ध, ममता को ही करना पड़ता वह घर खर्च में कटौती करती और किसी तरह से बच्‍चों के खर्चे पूरे करती । ममता एक धार्मिक प्रवृति की महिला थी। रोज सुबह शाम पडोस के मन्‍दिर में जाना उसका नित्‍य नियम था। मन्‍दिर के कई उत्‍सवों में भी वह भाग लेती थी।...........जिन्‍दगी ऐसी ही घसीट घसीट कर चल रही थी । लेकिन महंगाई बढ़ते ही घर खर्च चलना मुश्‍किल हो गया ।

आजकल महंगाई ने अच्‍छे अच्‍छों के कसबल निकाल दिये हैं, उधर हमारे श्रीमान किस्‍म के नेता घपलों पर घपले करे जा रहे हैं उन्‍हें जनता की परेशानी से कोई मतलब नहीं है। चोरी उपर से सीनाजोरी यह हमारे नेताओं का जन्‍म सिद्ध अधिकार है, जब महंगाई बढती है जनता त्रस्‍त होती हैं आवाज उठाती है तो खाद्य मंत्री बयान दे देते हैं मेरे पास कोई जादू का डण्‍डा नहीं है जो महंगाई कम कर दूं, सरकार भी अपनी विवशता बता देती है और मंहगाई राकेट की तरह और उपर चली जाती है। कहॉं तक कहें........ हरि अनन्‍त हरि कथा अनन्‍ता वाली बात है।

खैर हमारे नायक अनिल बढ़ई को अपनी लत से कोई नहीं छुड़ा सकता था। ममता परेशान थी, बाजार में एक वस्‍तु के दाम बढ़ते तो सब्‍जी वाले, राशन वाले, स्‍कूल की फीस, बसों के किराये गैस सभी के दाम बढ जाते, जरा ममता के हालात पर गौर करें उसका गुजारा कैसे चलता होगा। अनिल साहब तो अनिल साहब ही ठहरे उन्‍हें शाम को अपना गम गलत करना जरूर होता। ममता परेशान थी, उसने एक निर्णय लिया, अब जहॉ भी अनिल काम करने जाता ममता मालिक से कह देती कि इनकी मजदूरी के पैसे इन्‍हें न दिये जायें मै स्‍वयं आकर ले जाउॅगी यह तो शराब में खर्च कर देते है। कुछ मालिक मान जाते कुछ नहीं मानते। जो मालिक मान जाते उनसे मिले पैसों से ममता अपना घर चला देती। अब अधिक तर लोग ममता को पैसे देने लगे, अनिल मेहनत तो दिन भर करता पर पैसे ममता को मिल जाते। उसे इन मालिकों पर बडा गुस्‍सा आता, वह इन्‍हें सबक सिखाने के मनसूबे बनाता, इधर कई दिनों से उसके पेट में एक घूंट भी नहीं गया था। रोज शाम को तलब लगती, देशी शराब के ठेके तक जाता और शराब ऐसी चीज हैं जिसमें उधार नहीं चलता वह मन मसोस कर वापस घर आ जाता।

एक दिन एक नयी बनने वाली कोठी में अनिल को कुछ काम मिल गया। नया मकान बन रहा था, टाइल, लकड़ी, सैनेटरी का सामान, बिजली का सामान रखा हुआ था। वह अपना काम कर रहा था काम करते करते उसके दिमाग में एक योजना बनी कि क्‍यों न इस सामान में से एक दो चीज चुरा ली जाये और उसे बेचकर अपना शौक पूरा कर लिया जाये । वह रोज काम करते करते एक दो चीज दिन में उठा लेता और शाम को उसे बेचकर अपना शौक पूरा कर लेता। धीरे धीरे मकान से सामान कम होने लगा मालिक को शक तो हुआ लेकिन किसी पर बिना देखे इल्‍जाम कैसे लगाये? उसने छुपकर निगरानी करनी शुरू की। और एक दिन अनिल को सामान चुराते रंगे हाथ पकड लिया । पुलिस बुलाई गई, पुलिस ने जब अनिल से पूछा तो उसने चोरी की बात से इन्‍कार कर दिया । हमारी पुलिस तो पुलिस ठहरी उसने अपना तीसरा नेत्र खोला, अनिल की बहुत पिटाई की, इतनी कि अनिल के दोनों हाथों की हड्‌डी टूट गई। ममता के माफी मांगने पर पुलिस ने उसे छोड़ तो दिया लेकिन अब वह काम नहीं कर सकता था। जिन हाथों से वह कमाता था अब बेबसी में आकर उन्‍हें ही देखता रहता एक दिन उसे इतनी ग्‍लानि हुई कि उसने रेल के पहिये के नीचे आकर आत्‍महत्‍या कर ली.............।

समाज हमारा बहुत ठीक सोचता है चोर का बेटा चोर, सेठ का बेटा छोटा सेठ, डा0की पत्‍नि डाक्‍टरनी, मास्‍टर की पत्‍नि मास्‍टरनी। उस चोरी से ममता के घर को लोग चोर का घर कहने लगे। एक तरह से वह अहिल्‍या बन गई, समाज से कटी, न कोई रिश्तेदार, न कोई बोलने वाला न कोई मददगार। इस बात को कई साल गुजर गये, बच्‍चे अब बडे हो गये थे उन्‍होने ही मॉ के बोझ को कुछ कम किया, ममता सुचारू रूप से घर चला रही थी दो पैसे भविष्‍य के लिये बचा भी रही थी। ममता की और बच्‍चों की जिन्‍दगी अब आराम से कट रही थी, लेकिन एक दर्द जो सबके दिलों में था वह यह कि लोग उनके घर को अब भी चोर का घर कहते थे ।

एक दिन मन्‍दिर में एक सन्‍त आये, ममता रोज उनके प्रवचन सुनने जाती जो भी फूल अक्षत उसके पास होते वह बडी श्रद्धा उसे उन सन्‍त के चरण में रख आती । कथा यज्ञ का समापन का दिन आने वाला था। मन्‍दिर समिति ने समापन के रोज एक बहुत बडे भण्‍डारे का आयोजन करने का निर्णय लिया उसके यह लिये कार्य योजना बनी की रोज शाम के समय लोग चन्‍दा मांगने जायेगें हर घर से एक सदस्‍य चन्‍दा मांगने जरूर जायेगा, महिला बच्‍चों युवाओं ने सबने हामी भर दी, अपने घर से ममता ने जाने का निश्‍चय किया। रोज शाम को सब लोग मन्‍दिर में जमा होते वहाँ से मन्‍दिर की गोलक लेकर चन्‍दा मांगने निकल जाते, जब रात होने लगती तो गोलक आखिरी घर में रख दी जाती अगले दिन उसी घर से चन्‍दा मांगने का कार्यक्रम शुरू होता। आखिरी घर ममता का पड़ता था, ममता आज बडी प्रसन्‍न थी, उसने इस काम के लिये काफी पैसे जमा रख रखे थे पूरी शिद्‌दत, इमानदारी से आज गोलक उसके घर में रहेगी, ममता आज एक निर्मल शान्‍ति, निर्मल आनन्‍द का अनुभव कर रही थी, उसके पति के पापों का आज निराकरण हो जायेगा । शाम को चन्‍दा मांगने के बाद गोलक उसके घर में रख दी गयी, ममता आज सारी राम जगकर गोलक की रखवाली करेगी, न जाने रात के कौन से पहर में उसकी आँख लग गयी.....सुबह जागने पर देखा कि मन्‍दिर की गोलक उसके घर में नहीं थी................. ।

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RK Bhardwaj

151/1 Teachers’ Colony

Govind Garh,Dehradun\

(Uttarakhand)

e mail: rkantbhardwaj@gmail.com

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