सोमवार, 11 अप्रैल 2011

अनन्त आलोक की लघुकथाएँ

लघु कथाएं

1․ प्‍यार और सत्‍कार

पिता पु़त्र दोनों एक ही दुकान में काम करते हैं। काम कोई बैठने वाला काम नहीं हाथ से करने वाला काम है, भारी। सुबह से काम करते दोनों थककर चूर हो चुके है। शाम होने को आई फिर भी थकान की परवाह किए बिना लगे हुए है। ग्राहक खड़ा है। काम भी बड़े प्‍यार और ईमानदारी से करते हैं तभी तो ग्राहक दौड़े चले आते हैं। शाम का समय होने लगा तो निकट ही घर से मालकिन पूछने आई कि आज डीनर में क्‍या बनाएं पिता ने पुत्र की और इशारा करते हुए पूछा ''हां बेटा आज क्‍या खाओगे'' ''कुछ भी ले आइए पापा, खा लेंगे'' काम करते हुए पुत्र ने जवाब दिया ''अच्‍छा लाओ ऐ काम मैं कर देता हूं , तुम स्‍वयं ही ले आओ जो भी खाना चाहते हो ''पिता ने बैठते हुए कहा ''नहीं पापा आप पहले ही बहुत थक चुके हैं आप विश्राम कीजिए, काम निपटाने के बाद मैं सब्‍जी भी स्‍वयं ही ले आउंगा'' पुत्र ने जवाब दिया ''अच्‍छा ठीक है तुम भी बहुत थक चुके हो सब्‍जी मैं ही ले आता हूं तुम ठीक से काम निपटाओ पिता ने सब्‍जी के लिए बैग उठाते हुए कहा। पास खड़ा गा्रहक इस घोर कलयुग में पिता पुत्र के बीच इतना प्‍यार और सत्‍कार देख द्रवित हो गया।

2․ इज्‍जत

नशे में धुत लड़खड़ाते मित्र को सहारा देकर घर छोड़ने आये सुनील ने याद दिलाया ''देखो जगपाल तुम्‍हे कितनी बार समझाया है, शराब पीना अच्‍छी आदत नहीं है इससे न केवल तुम्‍हारा स्‍वास्‍थ्‍य बिगड़ रहा है अपितु रिश्‍तेदारों, सगे संबंधियों और समाज में भी बदनामी हो रही है'' ''बदनामी ! कैसी बदनामी अरे तुम क्‍या जानो समाज में हमारी कितनी इज्‍जत होती है लोग स्‍पेशल कमरे में बिठाते हैं, दारु,सलाद,नमकीन और अन्‍य जरुरी सामान इज्‍जत के साथ वहीं छोड़ कर जाते हैं और हां। खाना भी वहीं टेबल पर आता है शान से। तुम पीते नहीं हो न तुम क्‍या जानो कितनी इज्‍जत करते हैं लोग। अरे तुम्‍हे तो कोई यह भी नहीं पूछता होगा कि खाना भी खाया है या नहीं ''जगपाल ने लड़खडाती जुबान से जवाब दिया। ''तुम्‍हारी बात सोलह आने सच है, खाने पीने वालों का मेजबान पूरा पूरा ध्‍यान रखते हैं, इतना ही नहीं गंदी नाली में गिरने पर उठाया भी जाता है। और लड़खड़ाने पर घर तक भी छोड़ा जाता है, जैसे मैं तुम्‍हे छोड़ने आया हूंॅ लेकिन मित्र यह इज्‍जत नहीं सहानुभूति है। ठीक उसी प्रकार जैसे एक मरीज के प्रति रखी जाती है, जिस प्रकार एक बिमार व्‍यक्‍ति की सुख सुविधा का ध्‍यान रखा जाता है। और रही बात खाने के लिए पूछने की तो वह इस लिए नहीं पूछा जाता क्‍योंकि नशा न करने वाला व्‍यक्‍ति अपना ध्‍यान स्‍वयं रख सकता है उसे कब क्‍या चाहिए वह मांग लेता है'' सुनील ने उतर दिया ।

5 blogger-facebook:

  1. sunder kahani ea sarthak sandesh detee hai.....

    jai baba banaras......

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  2. anant alok11:51 am

    Respected Ravi ji I am greatful to you for publishing my short storeis and Kavy sangrah on RACHNAKAR I am unable to write of comment in hindi kindly help.

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी रचनाएँ अच्छी बन पडी हैं. आपको तथा सम्पादक जी दोनों को बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  4. सार्थक लधुकथा के लिए बधाई ।

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  5. बधाई हो .................. अच्छा प्रयास है

    उत्तर देंहटाएं

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