अनन्त आलोक की ग़ज़लें

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गजल 1

देखते ही उनको हम यूं खो गये

खयालों ही खयालों में उनके हो गये।

 

खूब मेहमां नवाजी करते है आप

हमें घर बुलाया और खुद सो गये।

 

वो आए हमारा हाल ए मर्ज पूछने

देखते ही हमको वो रो - रो गये।

 

ठीक नही हालात आजकल शहर में

न लौटे अब तलक सुबह जो गये।

 

यूं तो भाई का रिश्ता है अपना ‘‘अनन्‍त''

बीज ऐ नफरत मगर वो खुद ही बो गये।

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ग़ज़ल 2

मेघ घिर आए और रात हो गई

देखते ही देखते बरसात हो गई।

 

उठी नजर उनकी हम से मिली

नजर ही नजर में बात हो गई।

 

मैं भी अजनबी तुम भी अजनबी

वक्‍त ने मिलाया मुलाकात हो गई।

 

मेह बरसा खुदा की रहमत हुई

उजली - उजली ये कायनात हो गई।

 

यूं फिसलते न थे हम हर कहीं

बातों - बातों में जाने क्‍या बात हो गई।

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ग़ज़ल 3

जबसे तेरी जुल्‍फों का साया मिला है

मुझसे बड़े अदब से हर अपना पराया मिला है।

 

यूं तो हर मोड़ मे है दूध के धुले यहां

न अब तलक कोई दूध का नहाया मिला है।

 

बडे़ अरमानों से दिया था हमने ये दिल उनको

अब तलक दिल मिला न किराया मिला है।

 

कम ही मिले मुझे जानवरों के सताये आदमी

जो भी मिला आदमी का सताया मिला है।

 

थमे न दस्‍त प्‍याला उठा लिया खुद ब खुद

मुझे न कोई किसी का पिलाया मिला है।

 

होता है ये कम्‍बख्‍त इश्क खूबसूरत बलाओं से ही

न किसी बद सूरत पे दिल आया मिला है।

 

ताउम्र निभा सके जो साथ तेरा ‘अनन्‍त'

न ऐसा कोई हमको हम साया मिला है।

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2 टिप्पणियाँ "अनन्त आलोक की ग़ज़लें"

  1. कम ही मिले मुझे जानवरों के सताये आदमी

    जो भी मिला आदमी का सताया मिला है।

    ताउम्र निभा सके जो साथ तेरा ‘अनन्‍त'

    न ऐसा कोई हमको हम साया मिला है।

    ज़िन्दगी की सच्चाईयों से मिलवा दिया।

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  2. वंदना जी,गजलों पर प्रतिक्रिया के लिए आभार

    उत्तर देंहटाएं

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