शनिवार, 2 अप्रैल 2011

यशवन्‍त कोठारी का व्यंग्य - परनिन्‍दक नियरे राखिये

वक्‍त जब पर लगाकर उड़ता है तो सब कुछ बदल जाता है। पुरानी कहावत है कि, निन्‍दक नियरे राखिये, मगर समय के साथ-साथ अब कहावत भी बदल गई है और इसका नया रूप ‘परनिन्‍दक नियरे राखिये' बनकर सामने आया है। सच पूछो तो परनिन्‍दा का आनन्‍द ब्रह्मानन्‍द सा है। जो व्‍यक्‍ति परनिन्‍दा नहीं कर सकता तो वो अपने जीवन में कुछ नहीं कर सकता। रोटी बोटी के बाद जो सबसे महत्‍वपूर्ण काम है वो परनिन्‍दा है। अपने-अपने आंगन में एक छोटी सी कुटिया बनाकर परनिन्‍दकों को बसा लीजिए। आपका जीवन आनन्‍द से परिपूर्ण हो जाएगा। परनिन्‍दा क्‍लबों के सदस्‍य बन जाइए, फिर लीजिए मजा। जिस तरह सभी को चापलूसी पसन्‍द है, उसी प्रकार से परनिन्‍दा भी सभी को पसन्‍द है। बस निन्‍दा करते समय इस बात का ध्‍यान रखिए कि जिसकी निन्‍दा की जा रही है वो अनुपस्‍थित हो। यदि उपस्‍थिति में परनिन्‍दा शुरू कर दी तो बातचीत जो है वो बीरगाथा काल तक पहुंच जाएगी या आपको आतंकवाद का शिकार होना पड़ सकता है। परनिन्‍दा के क्षेत्र में महिलाएं जो योगदान करती हैं, वो इतिहास में स्‍वर्ण अक्षरों में लिखे जाने योग्‍य है। परनिन्‍दा के लिए हमेशा समय की कमी रहती है अर्थात कितना भी समय हो निन्‍दक को समय कम लगता है। साहित्‍य, राजनीति आदि क्षेत्र परनिन्‍दकों से भरे पड़े हैं। जो बिना कुछ किये जीवन में सफल होना चाहते हैं, उनके लिए परनिन्‍दा से बढ़कर कोई अन्‍य नुस्‍खा हो ही नहीं सकता है।

राजनीति तथा साहित्‍य में परनिन्‍दकों का योगदान अलग से लिखा जाना चाहिए। आलोचक और आलोचना मूल रूप से परनिन्‍दा ही है। यदि कभी वे परनिन्‍दा से ऊपर उठते भी हैं तो इसके कारण व्‍यक्‍तिगत हैं।

आप तो जानते ही हैं जीवन के लिए खाना, पीना, हवा, पानी जितनी जरूरी है उतनी ही परनिन्‍दा करना जरूरी है, परनिन्‍दा आम आदमी का लवण भास्‍कर चूर्ण है, त्रिफला चूर्ण है, जो हाजमा दुरस्‍त करता है। पेट साफ करता है। मनोविकारों से बचाता है और स्‍वस्‍थ करता है। अगर व्‍यक्‍ति स्‍वस्‍थ होगा तो देश भी स्‍वस्‍थ होगा। हे पाठको ! देश के स्‍वास्‍थ्‍य के खातिर परनिन्‍दक को अपने साथ रखें और देश के स्‍वास्‍थ्‍य को समुन्‍नत करने में अपना योगदान करे।

परनिन्‍दकों से आपको अकेलापन नहीं लग सकता। बोरियत नहीं हो सकती। जब भी कभी अकेलापन लगे, विरह सताने लगे, किसी परनिन्‍दक को पकड़ लीजिए और अपनी आत्‍मा को तृप्‍त कीजिए।

परनिन्‍दा का नशा भी क्‍या चीज है साहब। जिसे इस नशे का स्‍वाद आ गया उसे शराब, ड्रग्‍स, चरस का नशा बिल्‍कुल बेकार लगता है। एक बार शुरू तो कीजिए बस आदत पड़ जाएगी।

मेरी विनम्र राय में परनिन्‍दा को लोकप्रिय बनाने के लिए कार्यशालाएं आयोजित की जानी चाहिए। सेमिनार भी किये जा सकते हैं। बैकों को लोन देकर परनिन्‍दा के राष्‍ट्रीय कार्यक्रमों को लोकप्रिय बनाना चाहिए।

सच में आप पूछें तो परनिन्‍दा के बिना मोहेल्‍लेदारी अधूरी है। दफ्‍तर का जीवन व कार्य-कलाप अधूरा है।

हर परनिन्‍दक यह मानता है कि वो तो केवल सच को बयान कर रहा है, सच के अलावा कुछ भी नहीं कह रहा है या फिर यों कि जो कुछ भी वो कह रहा है, वही सच है। मन से मन को राहत मिलती है। एक परनिन्‍दक दूसरे परनिन्‍दक को देखकर खुश होता है और वे एक-दूसरे को अपना निन्‍दा अध्‍याय सुनाने में मग्‍न हो जाते हैं।

परनिन्‍दकों का मनोविज्ञान भी बड़ा अच्‍छा होता है। वे जानते हैं कि परनिन्‍दा के अन्‍तर्गत सब कुछ जायज हो जाता है। परनिन्‍दा का इतिहास, भूगोल और राजनीति सब कुछ सहज है। परनिन्‍दकों ने इतिहास की धारा को ही बदल दिया है। वे चाहें तो क्‍या नहीं कर सकते। कानों की कच्‍ची भूख परनिन्‍दकों को अक्‍सर ढूँढते फिरती है। इनके बिना शादी, त्‍यौहार, मेला, ठेला, आयोजन, प्रयोजन, नुक्‍कड़, गली, मोहल्‍ला, सब कुछ बड़ा सूना-सूना लगता है। गांव की बड़की भौजी हो या रामेसरी भुवा या शहर की नुक्‍कड़ वाली आंटी सब परनिन्‍दक हैं थे और रहेंगे। आपकी बोरियत दूर करने में इनकी भूमिका बनी रहेगी।

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यशवन्‍त कोठारी

86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर,

जयपुर-302002 फोनः-2670596

ykkothari3@gmail.com

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