सुरेन्द्र अग्निहोत्री की कविता

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क्‍या कभी आपको

यह आया है ख्‍याल

कैसे कैसे जोड़ा जाता है

अपने लिये माल

इसका गणित समझना

मैने जाना अभी हाल

जिसने छोड़ दिये है

कई सारे सवाल?

 

कुछ बिके हुये

कुछ टिके हुये

बिके हुये हो गये मालामाल

टिके हुये रहे फटे हाल

एक बार फिर

वही खड़ा हुआ सवाल?

 

बिक कर जब

दूर हो सकते सन्‍ताप

तो क्‍यों नही करते

एक बार यह पाप

यह बात अक्‍सर

घरों में दोहराई जाती है

लेकिन कुछ को

समझ नही आती है

वह तो आक्रोश में

हाथ ऊपर उठाकर तैयार है

 

गैर बराबरी से

लड़ने के खातिर

भट्‌टी में तपने को

मेहनत से

पूरा करने तैयार है

आँखों में पलते सपने को

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-सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री

राजसदन-120/132

बेलदारी लेन लालबाग

लखनऊ

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