शनिवार, 16 अप्रैल 2011

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की प्रेम कविताएँ

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देह का संगीत

 

मूझे चूमो

और फूल बना दो

मुझे चूमो

और फल बना दो

मुझे चूमो

और बीज बना दो

मुझे चूमो

और वृक्ष बना दो

फिर मेरी छाँह में बैठ रोम रोम जुड़ाओ ।

 

मुझे चूमो

हिममगिरि बना दो

मुझे चूमो

उद्गम सरवर बना दो

मुझे चूमो

नदी बना दो

मुझे चूमो

नदी बना दो

मुझे चूमो

सागर बना दो

फिर मेरे तट पर धूप में निर्वसन नहाओ ।

 

मुझे चूमो

खुला आकाश बना दो

मुझे चूमो

जलभरा मेघ बना दो

मुझे चूमो

शीतल पवन बना दो

मुझे चूमो

दमकता सूर्य बना दो

फिर मेरे अनंत नील को इंद्रधनुष सा लपेट कर

मुझमें विलय हो जाओ।

---

 

पहाड़ों को मेरे ऊपर गिरने दो

 

पहाड़ों को मेरे ऊपर गिरने दो

नदियों को मुझे बहा ले जाने दो

सागर को किनारे पर

मुझे बार बार पटकने दो

मै अपनी शक्ति की परीक्षा

करना चाहता हूँ ।

 

क्योंकि यह अंततः

तुम्हारे प्यार की शक्ति है ।

जिसके सहारे

मैं पर्वत पर चढ़ा हूँ

नदियों को मैंने पार किया है

सागर नाप आया हूं ।

 

इससे क्या फर्क पड़ता है

कि हर पर्वत पर तुम बादलों की तरह थी

हर नदी में धूप और चाँदनी की तरह

हर सागर में गर्जन की तरह ।

 

एक चोटी से दूसरी चोटी तक जाने में

मैं बादलों से ही भीगा हूँ

एक तट से दूसरे तट तक पहुंचने में

मैं चाँदनी में नहाया

और धूप में गर्म हुआ हूं

और सागर ? उसी की गर्जन के सहारे तो जिया हूं ।

 

उसी को नापते नापते

मैंने खुद को पहचाना है ।

पछाड़ खाकर भी

अपने में सिमट जाना

मैंने उसी से सीखा है

उद्वेलन ही जीवन का

उउज्वलतम क्षण है

उसी ने कहा है ।

 

बेग से फेंकी गयी

रेत भी चोट करती है

उसी ने बताया है ।

 

मृत्यु को आने दो

अंतिम सांस तक तुम मेरे पास हो ।

जब पहाड़ मेरे ऊपर गिरेंगे

मैं बादलों को बाहों में कसे रहूंगा

जब नदियाँ मुझ पर फैल जायेंगी

मैं धूप और चांदनी को चूमूंगा

जब सागर मुझे

बार-बार तट पर पटकेगा

मैं याद करूंगा

यह जो अंधेरा आंखों के सामने छा रहा है

कितना तरल है ।

 

शराब से भीगे

तुम्हारे होंठों की तरह

वह मुझ पर झुका होगा

हर क्षण लुप्त होती मेरी चेतना को

स्पंदित करता ।

अँधेरे में संघर्षरत लहरें ही

नही चमकतीं

निराशा से लड़ता आदमी भी

रोशनी देता है ।

 

मैं इस रोशनी की

परीक्षा करना चाहता हूं ।

पहाड़ों को मेरे ऊपर गिरने दो

नदियों को मुझे बहा ले जाने दो

सागर को किनारे पर

बार बार मुझे पटकने दो

मैं इस रोशनी की

परीक्षा करना चाहता हूं

क्योंकि यह अंततः

तुम्हारे प्यार की ही रोशनी है

यानी

आकांक्षा और चुनौती के बीच

आत्मा में एक संगीत की तलाश

एक प्रकाश स्तम्भ का अहसास ।

 

मै उसे अपने बाद भी

जीवित देखना चाहता हूं ।

पहाड़ों को मेरे ऊपर गिरने दो...

----.

 

तुम्हारे हाथो में

 

एक रंग भरी कूची की तरह

मैने खुद को तुम्हारे हाथों में दे दिया ।

 

तुम उससे अपनी एड़ियां रगड़ सकती हो

और ऐसी भयानक आकृति भी

बना सकती हो जिसे देखकर खुद काँप जाओ ।

 

जरूरी नहीं है कि रंगों का एक विशाल सरोवर हो

जिसमें इस सारे दृश्य जगत् के साथ हम कूद पड़ें ।

 

यदि हम रचना चाहते है

तो तूलिका का एक रंगा घात

एक डबडबाया क्षण

एक गंध भरी सांस से

कुछ भी रच सकते हैं

हां यदि हम रचना चाहते हैं ।

 

बड़े से बड़े फलक पर

एक बूंद चीख सकती है

हर्ष से या अकेलेपन से

और अपने से बहुत बड़े को

जन्म दे सकती है !

 

अर्थ हम अपने लिए रचते हैं

मांगते नहीं ।

ऐसा कुछ भी नहीं है जो हमसे बड़ा हो

यदि हम कुछ भी छोटा करना न चाहते हों ।

 

मुझे तुम इस विराट जंगल के किनारे

घास के इस टुकड़े पर ऊंचे पेड़ों के मुकाबले

मिट्टी में घंसा छोड़ जा सकते हो ।

फिर भी मैं इतराता रहूंगा ।

क्योंकि हो सकता है कल तेज हवा चले

और मैं तमाम तिनकों के साथ किसी बारिश में बहकर

उस निर्झर से जा मिलूं ।

 

जो नयी बस्तियों के बीच से बहता हो ।

संभावनाएँ निरंतर हैं

जिंदगी की खोज जो रचना है

रचना - जो सार्थक करती है

महत्वाकांक्षा नहीं

जो दूसरों को छोटा करने से ही पनपती है ।

 

मैने खुद को तुम्हारे हाथों में

इस जंगल को छोटा करने नहीं सौंपा - कुल्हाड़ी की तरह

एक रंग भरी कूची की तरह

मैने खुद को तुम्हारे हाथों में दे दिया ।

---.

 

तुम्हारे साथ रहकर

 

तुम्हारे साथ रहकर

अक्सर मुझे ऐसा महसूस हुआ है

कि दिशाएं पास आ गयी हैं

हर रास्ता छोटा हा गया है

दुनिया सिमटकर

एक आंगन सी बन गयी है

जो खचाखच भरा है

कहीं भी एकान्त नहीं

न बाहर न भीतर ।

 

हर चीज का आकार घट गया है

पेड़ इतने छोटे हो गये हैं

कि मैं उनके शीश पर हाथ रख

आशीष दे सकता हूं

आकाश छाती से टकराता है

मैं जब चाहूँ बादलों से मुंह छिपा सकता हूं ।

 

तुम्हारे साथ रहकर

अकसर मुझे महसूस हुआ है

कि हर बात का एक मतलब होता है

यहाँ तक कि घास के हिलने का भी

हवा का खिड़की से आने का

और धूप का दीवार पर

चढ़कर चले जाने का ।

 

तुम्हारे साथ रहकर

अक्सर् मुझे लगा है

कि हम असमर्थताओं से नहीं

सम्भावनाओं से घिरे हैं

हर दीवार में द्वार बन सकता है

और हर द्वार से पूरा का पूरा

पहाड़ गुजर सकता है ।

 

शक्ति अगर सीमित है

तो हर चीज अशक्त भी है

भुजाएं अगर छोटी हैं

तो सागर भी सिमटा हुआ है

सामर्थ्य केवल इच्छा का दूसरा नाम है

जीवन और मृत्यु के बीच जो भूमि है

वह नियति की नहीं मेरी है ।

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