एस के पाण्डेय की बाल रचना - केंचुआ

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बच्चों के लिए: केँचुए का जीवन

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(१)

पैर न होता केँचुआ के बिना पैर के चलता है ।

दौड़ न पाता धीरे-धीरे पेट के बल सरकता है ।।

माटी, कीचड़, खेत में रहता बरसात में ज्यादा दिखता है ।

सांप के बच्चे जैसा लगता पर बहु सीधा होता है ।।

 

(२)

हाथ से पकड़ो गिर-गिर जाए थोड़ा चिकना होता है ।

पत्ती, माटी खाकर जीता माटी में ही सोता है ।।

चिड़ियाँ भी इसको खा जाए पैर के नीचे दबता है ।

हल-ट्रैक्टर से खेतों में यह कटता, मरता रहता है ।।

 

(३)

लेकिन केँचुए में होती बहुत अधिक जीवटता है ।

दो भागों में कटने पर भी यह जीवित रह सकता है ।।

पत्ती, मिट्टी की बात ही क्या पत्थर भी हजम कर जाता है ।

पानी-वायु प्रवेश हेतु मिट्टी में राह बनाता है ।।

 

(४)

काम न आये कोई इसके सबके काम ये आता है ।

सीधा-साधा छोटा सा पर काम बड़ा कर जाता है ।।

मिट्टी को पोली करके उर्वरा शक्ति बढ़ाता है ।

पेड़-पौधे हैं जिससे बढ़ते उत्पादन बढ़ जाता है ।।

दबे-कटे-तड़फे फिर भी निज कर्तव्य निभाता है ।

केँचुआ जैसा जीव भी हमको परहित धर्म सिखाता है ।।

 

(५)

माटी में रहता, खाता, सोता अरु मर जाता है ।

माटी से देखो इसका कैसा अद्भुत नाता है ।।

केँचुआ अपने जीवन से हमको पाठ पढ़ाता है ।

अपनी माटी से प्रेम करो केँचुआ हमें सिखाता है ।।

 

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ. प्र.) ।

http://www.sriramprabhukripa.blogspot.com/

URL: https://sites.google.com/site/skpandeysriramkthavali/

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