शनिवार, 23 अप्रैल 2011

प्रमोद भार्गव का आलेख : खतरों से खेलते बचपन पर अंकुश

खतरों से खेलते बचपन पर सर्वोच्‍च न्‍यायालय की अंकुश लगाने की पहल एक अच्‍छी शुरूआत है। क्‍योंकि करतब दिखाने वाले नाबालिग बच्‍चों को प्रदर्शन के दौरान जिस अनुशासित संतुलन बनाए रखने के मानसिक तनाव से गुजरना होता है, निश्चित रूप से वह पीड़ादायी होता है। इसलिए इन बच्‍चों को संजीदगी से लेने की जरूरत है। हैरतअंगेज कारनामे दिखाने में दक्षता हासिल करने के प्रशिक्षण के बीच भी इन मासूमों को कठिन परिश्रम करने होते हैं। जिन्‍हें हम दण्‍ड के दायरे में भी ला सकते हैं। गरीबी और लाचारी की प्रतिच्‍छाया, मनोरंजन के पीछे दबी यातना को बाहर नहीं आने देती। सर्कस की जिंदगी बचपन को ही खतरे में नहीं डालती, बल्‍कि बौने लोगो के पैदायशी शारीरिक विकारों को तात्‍कालिक खुशी के केन्द्र में लाकर उन्‍हें भी उपवास के रूप में पेश करती है। बालिकाओं से यौनाचार की आशंका तो सर्कस में बनी ही रहती है, वन्‍यजीवों को भी क्रूरतापूर्वक कारनामे दिखाने के लिए मजबूर किया जाता है। इसलिए बचपन बचाओ आंदोलन की जनहित याचिका पर न्‍यायालय ने सर्कस में बच्‍चों की भरती पर रोक संबंधी अध्‍यादेश जारी करने का सरकार को जो हुक्‍म दिया हैं उस पर तो जल्‍द अमल होना ही चाहिए, नए-नए कीर्तिमान बनाने के लिए बच्‍चों के बीच जो होड़ लगाई जा रही है उसे भी बाधित करने की जरूरत है। क्‍योंकि इसे सामाचार माघ्‍यम ग्‍लेमराइज्ड करके जिस तरह से पेश करते हैं, उसे सफलता के लक्ष्‍यभेद का भ्रम मान लिया जाता हैं।

यह सही है कि बच्‍चों को नादान उम्र में ही आय का स्‍त्रोत बनाकर काम पर लगा देने से उनके बाल अधिकारों का हनन तो होता ही है, वह शिक्षा से भी कमोवेश बहिष्‍कृत हो जाते हैं। जबकि बच्‍चों को शिक्षा से वंचित करना संविधान के अनुच्‍छेद 21 ए के तहत उन्‍हें मिले मौलिक अधिकारों की उपेक्षा है। यह स्‍थिति उन्‍हें खेलने, अपने ढ़ंग से सोचने और मर्जी का काम करने की स्‍वतंत्रता से बाधित करती है। इसकी जड़ में जाएं और इसे कानूनी नजरिए से देखें तो यह संविधान द्वारा दी गई अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता की भी अवहेलना है। इन सब हालातों का खयाल रखते हुए ही शायद शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को स्‍पष्‍ट निर्देश दिये हैं कि वह देशभर में सर्कस कंपनियों पर छापे डालकर उनमें कार्यरत मनोरंजन का साधन बने बच्‍चों को छुड़ाए। अदालत ने यह भी माना है कि यहां इन बच्‍चों को कष्‍टदायी हालातों से गुजारते हुए जानलेवा बाजीगरियों से गुजरना होता है। इनमें करतबों के प्रदर्शन में जोर जबर्दस्ती भी बरती जाती है। संतुलन बिगड़ने की जरा सी चुक इनकी जान भी ले सकती है अथवा जीवनभर के लिए अपाहिज बना सकती है। इसलिए मानवीयता का तकाजा है कि तमाशे से मुक्‍ति दिलाकर उन्‍हें मौलिक अधिकारों से जोड़ा जाए।

वैसे सर्कसों में कोई माता-पिता अपने बच्‍चों को स्‍वेच्‍छा से नहीं सौंपते। इसके लिए अब बडे़ पैमाने पर बच्‍चों के खरीद-फरोख्त की जानकारियां आ रही हैं। गरीब परिवारों के बच्‍चों को बेहतर जिंदगी का प्रलोभन देकर और आमदनी का सशक्‍त जरिया बना देने का भरोसा देकर भी बच्‍चों को कमोबेश हथिया लिया जाता है। सर्कस की अंदरूनी दुनिया की दीवारों में बंद हो जाने के बाद, बाहरी दुनिया से इनका ताल्‍लुक खत्‍म जैसा हो जाता है। चूंकि सर्कस की दुनिया खुद यायावरी का हिस्‍सा है, इसलिए इनके पड़ाव स्‍थायी नहीं रहते। लिहाजा इन बालकों का अपने आत्‍मीय परिजनों से भी धीरे-धीरे संपर्क टूट जाता हैं।

सर्कसों के लिए नेपाल से भी बच्‍चे तस्‍करी कर के लाए जा रहे हैं। कुछ गैर सरकारी संगठन भी बच्‍चों के क्रय-विक्रय से जुडे पाए गए हैं। ये इन बच्‍चों को सर्कस, खतरनाक उदयोगों और अवैध कारोबारियों से मोटी धनराशि लेकर बेच देते हैं। यहां इन से बंधुआ मजदूरों जैसा व्‍यवहार किया जाता हैं। महाराष्‍ट्र उच्‍च न्यायालय में एक एनजीओ के खिलाफ गरीब बच्‍चों की खरीद फरोख्त से जुड़ा मामला विचाराधीन है। इससे यहां यह सवाल भी खड़ा होता हैं कि कुकुरमुत्तों की तरह बाल अधिकार संरक्षण के लिए उग आए एनजीओ वाकई में किसके हित साधने में लगे हैं। सर्कस और उद्योगों में कार्यरत बच्‍चों के यौन शोषण से जुड़े मामले भी सामने आ रहे हैं। बालिकाएं तो इस क्रूरता का शिकार होती ही हैं, बालकों को भी दरिंदे अपनी हवस का शिकार बनाने से नहीं चूकते। इसलिए अदालत ने बच्‍चों को सभी सर्कसों के जंजाल से मुक्‍त कराने के आदेश के साथ उचित पुनर्वास की भी हिदायत दी है। हालांकि महिला एवं बाल विकास मंत्रालय बच्‍चों के शारीरिक, मानसिक और यौनाचार से जुड़े मामलों पर नजर रखता है। बाल संरक्षण गृह भी इसी मकसद पूर्ति के लिए वजूद में लाए गए हैं, लेकिन भ्रष्‍टाचार के दलदल में धंसे इन महकमों से भी बच्‍चों पर अत्‍याचार और यौनजन्‍य खिलवाड़ करने के मामले सामने आते रहते हैं। इसके बावजूद लिप्‍त पाए जाने वाले अधिकारी व कर्मचारी साफ बच निकलते हैं। ऐसे बाल संरक्षण व बाल सेहत से जुड़े विभाग ही अपने कर्तव्‍यों का ईमानदारी से पालन नहीं कर रहे तो अन्‍य किस विभाग से इनके सुरक्षित भविष्‍य की अपेक्षा की जाए ? बच्‍चों को देश का भविष्‍य माना जाता है लेकिन जब देश का भविष्‍य ही भ्रष्‍टाचार की चौखट पर दम तोड़ रहा हो तो आशा और उम्‍मीद की किरण कहां से प्रकट हो ? सर्कस में भी इन बच्‍चों को तरजीह तब तक दी जाती है जब तक इनके शरीर में लचीलापन बना रहता है। क्‍योंकि इसी लोच की नजाकत इन्‍हें करतब से जोड़ती है। किंतु उम्र् बढ़ने से साथ जब लोच समाप्‍त हो जाता है और शरीर करतब दिखाने लायक नहीं रह जाता, तो इन्‍हें नौकरी से बेदखल कर दिया जाता है। ऐसे में परिवार से पहले ही वंचित हो चुके बालक से नौजवान हुए इन लोगों की गति, धोबी का कुत्‍ता न घर का न घाट का, वाली हो जाती है। चूंकि अन्‍य किसी काम में यह पारंगत नहीं होते इसलिए इनके सामने दो ही रास्‍ते बचे रहते हैं, भीख मांग कर गुजारा करें या चुल्‍लू भर पानी में डूब मरें। बहरहाल सर्वोच्‍च न्यायालय के आदेश को केंद्र सरकार को बेहद गंभीरता से लेने की जरूरत हैं। इन लाचारों की आशा इसी आदेश से बंधी है।

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संपर्क :

pramodsvp997@rediffmail.com

लेखक वरिष्ठ साहित्यकार व पत्रकार हैं.

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