रविवार, 24 अप्रैल 2011

पं. अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' की कविता - आँख का आँसू

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आँख का आँसू ढलकता देखकर ।

जी तड़प करके हमारा रह गया ।।

या गया मोती है किसी का बिखर ।

या हुआ पैदा रतन कोई नया ।। 1 ।।

 

ओस की बूदें कमल से हैं कढ़ीं ।

या उगलती बूँद हैं दो मछलियाँ ।।

या अनूठी गोलियों चाँदी मढ़ीं ।

खेलती हैं खंजनों की लड़कियाँ ।। 2 ।।

 

या जिगर पर जो फफोला था पड़ा ।

फूट करके वह अचानक बह गया ।।

हाय ! था अरमान जो इतना बड़ा ।

आज वह कुछ बूंद बनकर रह गया ।। 3 ।।

 

पूछते हो तो कहो मैं क्या कहूँ ।

यों किसी का है निरालापन नया ।।

दर्द से मेरे कलेजे का लहू ।

देखता हूं आज पनी बन गया ।। 4 ।।

 

प्यास थी इस आंख को जिसकी बनी ।

वह नहीं इसको सका कोई पिला ।।

प्यास जिससे हो गई है सौगुनी ।

वाह ! क्या अच्छा इसे पानी पिला ।। 5 ।।

 

ठीक कर लो जाँच लो धोखा न हो ।

वह समझते हैं मकर करना इसे ।।

आंख के आंसू निकल करके कहो!

चाहते हो प्यार जतलाना किसे । 6 ।।

 

आँख के आंसू समझलो बात यह ।

आन पर अपनी रहो तुम मत अड़े ।।

क्यों कोई देगा तुम्हें दिल में जगह ।

जबकि दिल में से निकल तुम यों पड़े ।। 7 ।।

 

हो गया कैसा निराला यह सितम ।

भेद सारा खोल तुमने क्यों दिया ।।

यों किसी का है नहीं खाते भरम ।

आँसुओं ! तुमने कहो यह क्या किया ।। 8 ।।

 

झांकता फिरता है कोई क्या कुंआ ।

है फंसे इस रोग में छोटे बड़े ।।

है इसी दिल से वह पैदा हुआ ।

क्यों न आँसू का असर दिल पर पड़े ।। 9 ।।

 

रंग क्यों इतना निराला कर लिया ।

है नहीं अच्छा तुम्हारा ढंग यह ।।

आँसुओं ! जब छोड़ तुमने दिल दिया ।

किसलिए करते हो फिर दिल में जगह ।।10।।

 

बात अपनी ही सुनाते हैं सभी ।

पर छिपाये भेद छिपता है कहीं ।।

जब किसी का दिल पसीजेगा कभी ।

आँख से आँसू कढ़ेगा क्यों नहीं ।।11।।

 

बूंद गिरते देखकर यों मत कहो ।

आँख तेरी गड़ गई या लड़ गई ।

जो समझते हो नहीं तो चुप रहो ।

किरकिरी इस आँख में है पड़ गई ।।12।।

 

है यहाँ कोई नहीं धुआँ किये ।

लग गई मिरचें न सरदी है हुई ।।

इस तरह आँसू भर आए किसलिए ।

आँख में ठण्डी हवा है लग गई ।।13।।

 

देख करके और का होते भला ।

आँख जो बिन आग ही यों जल मरे ।।

दूर से आँसू उमड़ कर तो चला ।

पर उसे कैसे भला ठंडा करें ।।14।।

 

पाप करते हैं न डरते हैं कभी ।

चोट इस दिल ने अभी खाई नहीं ।।

सोचकर अपनी बुरी करनी सभी ।

यह हमारी आँख भर आई नहीं ।।15।।

 

है हमारे औगुनों का भी न हद ।

हाय ! गरदन भी उधर फिरती नहीं ।।16।।

 

किस तरह का वह कलेजा है बना ।

जो किसी के रंज से हिलता नहीं ।।

आँख से आँसू छना तो क्या छना ।

दर्द का जिसमें पता मिलता नहीं ।।17।।

 

वह कलेजा हो कई टुकड़े अभी ।

नाम सुनकर जो पिघल जाता नहीं ।।

फूट जाय आँख वह जिसमें कभी ।

प्रेम का आँसू उमड़ आता नहीं ।।18।।

 

पाप में होता है सारा दिन बसर ।

सोच कर यह जी उमड़ आता नहीं ।।

आज भी रोते नहीं हम फूटकर ।

आँसुओं का तार लग जाता नहीं ।।19।।

 

बू बनावट की तनिक जिसमें न हो ।

चाह की छींटें नहीं जिन पर पड़ीं ।।

प्रेम के उन आसुओं से हे प्रभो ।

यह हमारी आँख तो भीगी नहीं ।।20।।

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