गुरुवार, 28 अप्रैल 2011

शशांक मिश्र ‘‘भारती'' की बाल कथा - दादा जी की चिन्ता

‘‘ दोस्‍तों , हमारा देश महान है, जहां अनेक महापुरुषों ने जन्‍म लिया है। वहीं पक्षियों की बात करने वाल सलीम अली की जन्‍मभूमि भी यह भारत है; जिन्‍होंने पक्षी विज्ञान पर अनेक पुस्‍तकें लिखी हैं। संसार में ऐसे देश भी हैं। जिनमें पशु-पक्षियों पर मुकदमा चलाया गया है।'' चेतना ने सभा का प्रारम्‍भ करते हुए कहा ।

‘‘ बिल्‍कुल सही कहा चेतना ने , हमारे देश के हरियाणा और राजस्‍थान में रहने वाले विश्‍नोई सम्‍प्रदाय के अनेक लोग वनों तथा पशुओं की रक्षा के लिए अपने प्राणों तक को तिनके के समान मानते थे। जब जोधपुर नरेश ने अपने महल के निर्माण के लिए लकड़ी प्राप्‍ति हेतु वृक्षों को काटने की आज्ञा दी तो उनकी आज्ञा के विरुद्ध विश्‍नोई सम्‍प्रदाय के करीब 300 स्‍त्री-पुरुषों ने ‘‘ पहले हमारे शरीर को काटो,, फिर पेड़ काटना'' कहते हुए अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। धन्‍य थे वे लोग।'' उपदेश ने बताया ,

-उपदेश भैया की बात सुनकर अगर आज के मानव को देखते हैं; तो उस समय की और आज की स्‍थिति में जमीन- आसमान का अंतर पाते हैं।'' प्रेरणा ने कहा।

-‘‘ प्रेरणा , अंतर तो है। आज का मानव पेड़ों की अंधाधुंध कटाई किए जा रहा है। एक के बाद, दस के बाद सौ, सौ के बाद हजार काटता जा रहा है। उसे चिन्‍ता नहीं हमारे पर्यावरण की; कि वह कितना असंतुलित हो गया है। पृथ्‍वी का आवरण घटता जा रहा है। हमारी पृथ्‍वी का तापमान भी बढ़ गया है।'' शिखर ने कहा।

बच्‍चों की सभा चल ही रही थी; कि तभी वहां घूमते हुए दादा जी आ गए। दादा जी को देखकर सभी बच्‍चे उठ खड़े हुए।

‘‘अरे ,बैठो-बैठो बच्‍चों, जरा मैं भी तो जानूं। किस बात पर विचार-विमर्श चल रहा है?''

‘‘ दादा जी , कितने आश्‍चर्य की बात है; कि प्‍शु और मानव दोनों की ही रचना भगवान ने एक साथ की है। लेकिन मनुष्‍य बहुत बदल गया है।'' चेतना ने कहा।

‘‘ बिल्‍कुल ठीक कहा तुमने चेतना। बच्‍चों, इस मनुष्‍य ने अपने स्‍वार्थ के लिए सभी मर्यादाओं को तोड़ दिया है। विश्‍व कल्‍याण की बात भुलाकर मानव अब सिर्फ अपने कल्‍याण की बात करने लगा है। वर्षों आगे तक की सुविधायें अभी से जुटाने लगा है।'' दादा जी ने बतलाया।

‘‘मनुष्‍य को ऐसा करते देखकर जंगली प‍शु-पक्षी और पेड़ क्‍या सोचते होंगे? उनकी दृष्‍टि में आज का मानव कितना गिर गया होगा दादा जी?'' मिलन ने पूछा ,

‘‘ बेटी, यह तो सच है कल ही स्‍वप्‍न में पीपल दादा मुझसे कह रहै थे; कि पशु जहां आज तक नहीं बदले , जंगल में शेर भी शिकार के बाद दूसरे पशुओं से भाईचारा रखता है। वहीं मनुष्‍य ने स्‍वार्थ में आकर सभी मर्यादायें भुला दी हैं। पता नहीं क्‍या करेगा आज का मानव? उसे ओजोन परत में हो गए इतने विशाल छिद्र की भी चिन्‍ता नहीं। सोचो क्‍या होगा मानव जाति और प्रकृति के संतुलन का?''

''बच्‍चों, इसके बाद कि पीपल दादा कुछ और कहते, तुम्‍हारी दादी मां ने मुझे जगा दिया। तब से मैं यही सोच रहा हूं, कि इस मानव का भविष्‍य क्‍या होगा?'' दादाजीने कहा।

-अच्‍छा दादा जी! अब हम सबको चलना चाहिए। देर हो रही है।, चेतना ने सभी से कहा।

इसके बाद सभी अपन-अपने घर चले गए।

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सम्‍पर्कः-दुबौला-रामेश्‍वर पिथौरागढ़

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