गुरुवार, 28 अप्रैल 2011

एस के पाण्डेय का व्यंग्य : चाय पीने-पिलाने के फायदे और नुकसान

हिंदुस्तान में बहुत पहले हर घर में गाय रखी जाती थी। और आज किसी-किसी घर में गाय मुश्किल से मिल पाती है। गाय भले ही मुश्किल से मिलती हो लेकिन हर घर में अब चाय रखी जाती है। कोई बिरला ही घर होगा जहाँ चाय न हो। मिले न मिले वह दूसरी बात है। पहले गाय थी और अब चाय है। इसका मतलब यह नहीं है कि जहाँ गाय होगी वहाँ चाय नहीं होगी। फिर भी जब हर घर में गाय थी तब हिंदुस्तान में चाय नहीं थी। और आज चाय है तो हर घर में गाय नहीं है। कुछ विद्वान इसमें कुछ रहस्य होने की बात करते हैं। इनका मानना है कि कहीं न कहीं कोई लिंक जरूर है। यह गुत्थी विद्वानों के लिए छोड़कर हम आगे बढ़ते हैं और अपने समझ की बात बताते हैं।

गाय से जितने फायदे थे। उतने चाय से नहीं है। गाय से कोई नुकसान नहीं था। लेकिन चाय से नुकसान भी है। फिर भी समय की बात है। आज चाय का समय है। पहले गाय का था। आज जिस घर में दूध नहीं भी होता है वहाँ भी चाय मिल जाती है। हिंदुस्तान में गाय-भैंस नहीं भी रहेंगी तो भी चाय मिलेगी। केवल काली नहीं दूध वाली भी। यहाँ जुगाड़ से दूध जो बन जाता है। खड़िया घोलकर।

गाँव से लेकर शहर तक चाय की पहुँच है। बहुत से गांवों में तो चाय, चाय न रहकर चाह हो गई है। चाह न मिलने पर बहुतों की आह निकल जाती है। छोटे बच्चों से लेकर बड़े-बूढ़े भी इसके दीवाने हैं। बच्चे क्या करें उन्हें तो आज माँ का भी दूध मुश्किल से नसीब होता है। इसलिए ही दूध से ज्यादा चाय पसंद करते हैं।

कई तरह की चाय यानी टी प्रचलन में है। जैसे डे टी, नाइट टी, मोर्निंग टी, नून टी, आफ्टर नून टी, इवनिंग टी। इसके अलावा बीएम टी (बिफोर मील टी), एएम टी (आफ्टर मील टी), बेड टी, टोइलेट टी, बाथरूम टी आदि। पीने वाले पीते हैं।

कहाँ तक बताएं कुछ लोग एक बार पीते हैं। कुछ लोग दो बार और कुछ लोग बार-बार पीते हैं। कुछ लोग ऐसे हैं जिन्हें चाय नुकसान करती है। नुकसान भले करती हो लेकिन पीते जरूर हैं। भले ही बिना दूध के या बिना चीनी के अथवा नमक मिलाकर पिएँ। कुछ लोग साधारण तो कुछ लोग असाधारण यानी स्पेशल पीते है। कुछ लोग देखकर, कुछ लोग दिखाकर और कुछ लोग छुपकर तो कुछ लोग छुपाकर भी पीते हैं।

कुछ लोग नहीं भी पीते हैं। कुछ लोग अपने घर पर नहीं पीते हैं। बाहर पीते हैं। शर्मा जी का कहना है कि चाय नुकसानदायक तथा लाभदायक दोनों हो सकती है। इनका मानना है कि चाय पीना पड़े तो लाभदायक और पिलाना पड़े तो हानिकारक होती हैं। कहते हैं कि मैं चाय नहीं पीता हूँ। लेकिन कोई पिलाना चाहे तो पी भी लेता हूँ। किसी का आग्रह ठुकराना किस भलमानुष का काम है ?

शुक्लाजी चाय चौकन्ने होकर पीते हैं। पीते समय ही कोई आ न टपके। यह चिंता लगातार बनी रहती है। जैसे आहट मिलते ही कुत्ते भौंकने लगते हैं। वैसे ही ये किसी की आहट पाते ही चाय पीना बंद कर देते हैं। छुपाकर रख देंगे। बाद में ठंडी ही सही पर खुश होकर पी जाते हैं। पत्नी कभी कह दे कि गर्म कर देती हूँ तो कहते हैं कि गर्म चाय नुकसान करती है। गैस खर्च होगी तो जाहिर सी बात है नुकसान तो होगा ही। चाय में मक्खी गिर जाय तो न ही चाय छोड़ते हैं और न ही मक्खी को। मक्खी फेंकने से पहले उसे चूस लेते हैं।

तिवारीजी सुबह के समय टहलने निकलते हैं। टहलते-टहलते एक दो चाय किसी न किसी के घर से रोज पी जाते हैं। एक बार किसी ने कहा कि चीनी थोड़ी कम हो गई है तो बोले कि चीनी का क्या करना है। बस गर्म होना चहिये। दरअसल आदत बस बोल गए कि चीनी का क्या करना है ? जब भी पत्नी चीनी लाने को कहती है तो यही कहते हैं। गर्म से ही मतलब हो तो खौलाकर पानी ही पी लिया जाय तो सेहत भी ठीक रहे ।

गाँव-शहर, कस्बों, बाजारों, गलियों, चौराहों आदि पर चाय आसानी से मिल जाती है।

दो रुपए से लेकर चालीस-पचास और सैकड़ों रूपये कप वाली चाय पी और पिलाई जाती है।

चौराहों-नुक्कडों के चाय की दुकानों पर भीड़ देखते ही बनती है। यहीं पर देश और समाज का भविष्य तय किया जाता है। सरकारें बनायी और बिगाड़ी जाती हैं। राजनीतिक पार्टियों व राजनेताओं के भविष्य की घोषणाएं की जाती हैं। कभी-कभी गाली-गलौज और मार-पीट तक की नौबत भी आ जाती है। जहाँ इतने अहम फैसले और मुद्दे होंगे। वहाँ यह सब तो आम बात है। संसद और विधानसभाएं इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।

कुछ लोग कहते हैं कि अरे उनकी बात न करो। दरवाजे पर चले जाओ तो एक कप चाय भी नहीं पिला सकते। लेकिन मेरे यहाँ से कोई बिना चाय पिए वापस नहीं जा सकता। बड़े भाई प्रधान हुए हैं। चीनी मुफ्त में उठा लेते हैं। कोटे की आधी चीनी इसी ओर आती है।

कई लोग किसी-किसी को बड़ी उम्मीद से चाय पिलाते हैं। उम्मीद पर पानी फिर जाने पर पछताते हैं और कहते हैं कि हमारे पास फालतू पैसा थोड़े था। लेकिन सोच रहा था कि काम करा देंगे। सैकड़ों चाय गटक गए। और आज साफ मुकर गए कि यह हम से नहीं हो पायेगा। कई लोग इसी गलतफ़हमी का शिकार होते हैं। और दूसरे मजे में चाय गटकते जाते हैं।

कई लोग इसी इंतजार में रहते हैं कि कोई चाय पिलाने वाला मिल जाता तो चाय पी लेते। कोई न मिले तो बहुत मायूस होकर लौट आते हैं और सोचते हैं कि आज का दिन खाली चला गया। कई लोग तो चाय पीते समय उठना भी भूल जाते हैं। चाहे जितनी देर हो रही हो, लेकिन टस से मस नहीं होते। कोई न कोई मसला छेड़ते रहेंगे। कभी–कभी तो ऐसा लगता है कि कुल्हड़ भी चट कर जायेंगे। उसमें कुछ बचा हो अथवा नहीं, उसे चूसते रहेंगे। लेकिन जब तक किसीके सब्र का बाँध टूट नहीं जायेगा, कदापि नहीं उठेंगे। इस स्थिति में कई बार मेरे सब्र का बाँध टूटा है। आखिर कुछ रूपये बचाने के चक्कर में कब तक बैठा रहा जाय ?

कुछ लोग काम के समय में बार-बार चाय पीकर आराम फरमाते हैं। और धन्यवाद देते हैं चाय शुरू करने वाले को। इनका कहना है कि चाय न होती तो काम करना मुश्किल हो जाता।

चाय-पीते बतलाते, समय पास हो जाता है। कोई पूछे भी कि कहाँ हैं ? तो लोग यह जानकर कि चाय पीने गए हैं, कोई खास बुरा नहीं मानते। सोचते हैं कि देर-सबेर आ ही जायेंगे।

एक बार एक लड़की को चाय के कारण लेने के देने पड़ गए। ससुराल में नई-नई आई थी। पति ने चाय बनाने को कहा। लड़की ने चाय बनाया और जैसे ही आकर बोली कि ‘टू कप टी--------’। एक सजिल्द किताब आकर उसके कनपटी से टकराई। और जब तक शोर सुनकर पड़ोस के दो-चार लोग इकट्ठा हुए लड़की धराशायी हो चुकी थी। पति महोदय जो लिखते थे। भले ही लेखक नहीं थे। बोले जा रहे थे तू कपटी, तेरा बाप कपटी, तेरे मामा-नाना, माँ-बहन, भाई सब कपटी। तेरा पूरा खानदान कपटी। हम काहे को कपटी। अभी दो दिन भी आये नहीं हुए और तेरी ये मजाल !

काफी का प्रचलन बढ़ने से चाय की अहमियत थोड़ी कम हुई है। फिर भी हिदुस्तान में चाय, पानी के साथ जुड़ गई है। पहले लोग किसी के आने पर कहते थे कि पानी-वानी पिलाओ। अथवा पानी-वानी पिए कि नहीं। और अब वानी के जगह पर चाय आ गई है और पानी से पहले बोल-चाल में अपना स्थान बना ले गई है। अब लोग चाय-पानी पीने-पिलाने की बात करते हैं। पानी-वानी का मतलब होता था ठंढा पानी पीकर ठंढे मन से वानी का प्रयोग यानी मधुर वानी से स्वागत-सत्कार, हाल-चाल पूछना आदि। लेकिन चाय ने वानी को पानी से सिर्फ जुदा ही नहीं किया बल्कि वानी यानी जिह्वा को जलाया भी। ऐसे में मधुर-वानी का अभाव लाजिमी है। वैज्ञानिक भाषा में इसे कहा जाता है कि चाय में उत्तेजना लाने वाला पदार्थ कैफीन होता है और चाय से लोगों में उत्तेजना आती है। भला बताइये उत्तेजना में कहीं मधुर-वानी निकल सकती है क्या ? बात एक ही है कहने के तरीके अलग हैं। आप खुद सोचिए कि जली जीभ से जली बात नहीं निकलेगी तो क्या अमृत में सनी बात निकलेगी ? यही कारण है कि मधुरी वानी ग्रंथों और संतों के प्रवचनों व नसीहतों तक ही सीमित होकर रह गई है। और घर-बाहर सभी जगह सबको जली-कटी बातें ही सुनने को मिलती है।

कई लड़के किसी लड़की को अपनी ओर हँसते देख, चाहे लड़की उसी पर हँस रही हो, चाय के लिए विनम्र निवेदन कर देते हैं। लड़की चाय के लिए तैयार हो जाय तो इसे अपना सौभाग्य समझते हैं और कापी-किताब खरीदने के लिए अथवा फीस के लिए जो पैसा होता है। उसे भी गवाँ बैठते हैं। और बाद में लड़की को भी।

चाय का बहुत महात्म है। एक ओर जहाँ कितने ही लोग चाय पीकर और पिलाकर बर्बाद हो गए हैं। वहीं दूसरी ओर कई लोग ऐसे भी हैं जो चाय पीकर और पिलाकर बन गए हैं।

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डॉ एस के पाण्डेय,

समशापुर (उ.प्र.)।

URL: https://sites.google.com/site/skpandeysriramkthavali/

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1 blogger-facebook:

  1. आप चाय की कई किस्मों से वाकिफ हैं और उनके इस्तेमाल से भी..
    शानदार लिखा है...

    दुनाली पर देखें
    चलने की ख्वाहिश...

    उत्तर देंहटाएं

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