शनिवार, 2 अप्रैल 2011

सीताराम कटारिया साबिर की ग़ज़लें

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ग़ज़ल-

एक

 

क्‍या करूं गर वो मेरे क़ाबू के बाहर हो गया

मेरा बेटा अब मिरे क़द के बराबर हो गया

 

बन गये खरगोश जब इस देश के सारे श्रमिक

तो इक इक पूंजीपति लहरा के अजगर हो गया

 

हर धरम के ढोंग ने ज़हनी तरक्‍की रोक दी

खाद वो डाली गई कि खेत बंजर हो गया

 

दो

न जाने कितने तीर सज गये खूनी कमानों में

परिन्‍दे उड़ के पहुंचे भी नही थे आसमानों में

 

तुम्‍हारे शहर की रंगीनियां हमने कहां देखीं

कि हम है उम्र भर से कैद जिस्‍मों के मकानों में

 

हवा से पंख लेकर उड़ने वाली ख़ाक से पूछो

वो कितनी देर तक छाई रहेगी आसमानों में

 

पहुंचते मंजिले मक्‍सूद पर वो काफिले कैसे

भटक कर रहे गये जो रहनुमाओं के बयानों में

 

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सीताराम कटारिया साबिर

उम्र-

लगभग पैंसठ साल

संप्रति-

अध्‍यापक के पद से सेवानिवृत्‍त हो कर स्‍वतंत्र लेखन

4 blogger-facebook:

  1. सीताराम कटारियाजी एक बेहतरीन शायर हैं और कई पुर्जों पर शेर लिख कर छोड़ देते हैं। सूर और कबीर की तरह उनकी कही गजलें सैकडॉं दूसरे लोगों को कँठस्थ हैं, पर उन्होंने कभी उनका रिकार्ड रखने की कोशिश नहीं की। वे बेहद सादगीपूर्ण जीवन गुजारते हुए एक सच्चे शायर की तरह रहते हैं और अपनी रचनाओं के लिए किसी से वाहवाही या पुरस्कार- सम्मान की अपेक्षा नहीं रखते। उनकी बेहतरीन गजलें प्रकाशित कर के रचनाकार ने बहुत महत्वपूर्ण काम किया है। राजनारायण बोहरे और राम भरोसे मिश्रा आदि को उनकी और रचनाएं सामने लाने का कष्ट उठाना ही चाहिए।

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  2. wah-wah ...bahut badhya.....pankti-pankti ati sundar

    उत्तर देंहटाएं

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