शनिवार, 30 अप्रैल 2011

एस के पाण्डेय की लघुकथा - पागलपन

पागलपन

“वह सिर्फ मेरी है। उसके और मेरे बीच में में कोई आया तो उसकी खैर नहीं.....।“ मोहन रामू से यह सब बोले जा रहा था। रामू बोला “ आखिर मैं क्यों आने लगा किसी के बीच में। मुझसे इन बातों से कोई मतलब नहीं है। मैं यहाँ पढ़ने आया हूँ। न कि किसी चक्कर में पड़ने। मेरे समझ में कुछ नहीं आ रहा है कि तुम मुझे क्यों लेक्चर दिए जा रहे हो।“

मोहन बोला “मुझे गोली दे रहे हो। तुम क्यों आने लगे किसी के बीच में। बताओ तो जरा पुस्तक के ऊपर यह क्या और क्यों लिख रखा है ? ”

यह कहकर मोहन ने रामू से पुस्तक छीन लिया। अब तक कई लड़के वहाँ इकट्ठा हो गए थे। सबने देखा पुस्तक के आवरण पर “पीपी” लिखा है। मोहन अब और बिगड़ चुका था बोला “ क्यों बे ‘पीपी’ लिखकर घूम रहा है और कहता है कि मुझे किसी चक्कर में नहीं पड़ना है।“

रामू बोला “ जैसे तुम अपने हाथों में, किताबों और कापियों में पीपी लिखकर घूमते हो उसी तरह सबको समझते हो। तुम्हें हर जगह बस पीपी, पीपी ही दिखाई पड़ती है। लेकिन यह देख यह फिजिक्स प्रैक्टिकल की पुस्तक है। मेरे पीपी का मतलब फिजिक्स प्रैक्टिकल है न कि पुष्पा पाठक।

मोहन ने किसी तरह रामू के गिरेवान से हाथ हटाया। सभी लड़के स्तब्ध रह गए। सिर्फ इतनी सी बात पर इतना हंगामा। लगता है इसे पीपी का भूत सवार है। यह इस बार भी फेल होगा। रामू बोला भूत नहीं यह पागलपन है। यह पागल हो गया है।

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ. प्र.)।

BLOG: http://www.sriramprabhukripa.blogspot.com/

URL: https://sites.google.com/site/skpandeysriramkthavali/

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