सोमवार, 4 अप्रैल 2011

शेर सिंह की कविताएँ

 

नदी की नियति

 

नदी का/ नाम ही है/ चलते जाना

और निरंतर गतिमान रहना

बड़े - बड़े शिलाखंडों

गिरि, काराओं से टकराती, लड़ती -

उछलती, मचलती

नदी तो/ सदा ही

प्रवाहमान है, गतिमान है

और यही, नदी की -

नियति भी है ।

लेकिन, नदी

अपनी चिर यात्रा के साथ- साथ

कई - कई इतिहास/ रचा लेती है

मिटा देती है

और, लाखों - करोड़ों की

नियतियों का/ पल भर में

फैसला कर लेती है ।

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इच्‍छाओं की क्‍या सीमा

ठहरे- ठिठके/ कुछ पल

और, रूकी हवा

चाहता हूं/ ये यूं ही रहें

मेरे संग/ बंधे हुए

नन्‍हा बच्‍चा

दोनों हाथों की

मुट्ठियां भींच

सोच लेता है

कि उसने/ जकड़ लिया है

आकाश को

अपनी मुट्ठियों में ?

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O शेर सिंह

अनिकेत अपार्टमेंट, प्‍लाट नं. 22

गिट्टीखदान लेआउट, प्रतापनगर

नागपुर - 440 022

E-Mail- shersingh52@gmail.com

1 blogger-facebook:

  1. इच्‍छाओं की क्‍या सीमा..............

    manish jaiswal
    Bilaspur
    Chhattisgarh

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