बुधवार, 13 अप्रैल 2011

सतीश चन्द्र श्रीवास्तव की कविताएँ

         (1) 

सोचता हूँ खतरनाक आप हैं
या साँप  
साँप काटता है तो भरता है फुफकार
तुम्हारे काटने का सलीका है बेआवाज़ 
साँप की तरह काट कर
गुम नहीं हो जाते आप
देते है साथ शव यात्रा तक
राख होते शरीर को देखते हैं
और चल देते हैं |

    (2)

ज़िन्दगी जो कुछ देती है सुबह
रात होते होते ले लेती है वापस
न रह पाते हैं विचार 
न ही रह पाता है आकार
बिगड़ जाता रूप
ग़ुम हो जाता है नाम
चटकने लगते सम्बंध
पुरानी पड़ने लगती है देहगंध
रह जाता है एक खालीपन बस |
      
           (3)


युद्ध भी होता अज़ीब
जो हारता है
वह तो हारता ही है
जो जीतता है
उसकी भी होती है हार
बड़ी अज़ीब होती है प्रीत
जो जीतता
वह तो जीतता ही है
जो हारता है
उसकी भी होती है जीत |

 


    (4)

चाहता तो हूँ कि चुप रहूं
कहीं भी कुछ भी न सोचूं मैं
पर क्या करू
दिमाग कोई शव तो नहीं
कि पड़ा रहे चुपचाप
और अपने ही ख़िलाफ
सुनता रहे झूठी सवेंदनाएं |

--

       
                                सतीश चन्द्र श्रीवास्तव
                                5/2ए रामानन्द नगर
                                अल्लापुर, इलाहाबाद

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